बला, खरैटी (Sida cordifolia) — root
बला, खरैटी — Sida cordifolia. प्रयोज्य अंग: मूल.
चित्र: Dr.S.Soundarapandian / Wikimedia Commons, Public domain
आयुर्वेदीय द्रव्य

बला, खरैटी बला

Sida cordifolia · Malvaceae

अन्य नाम: खरैटी, खरेटी, बरियारा मूल, बलामूल

प्रयोज्य अंग: मूल

बला (Sida cordifolia) एक छोटा भारतीय क्षुप है जिसका मूल शास्त्रोक्त बल्य — बलवर्धक — द्रव्य है। इसके नाम का अर्थ ही "बल" है। आयुर्वेद इसे मांस-दौर्बल्य, वात-व्याधि, स्नायु-विकार तथा रोगोत्तर पुनर्लाभ में प्रयुक्त करता है, और यह बला तैल तथा महामाष तैल का प्रधान घटक है।

बला, खरैटी — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसमधुर
गुणलघु, स्निग्ध, पिच्छिल
वीर्यशीत
विपाकमधुर
दोष-कर्मवात और पित्त का शमन
प्रभावबल्य (बलवर्धक), रसायन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Sida cordifolia
  • प्रयोज्य अंग: मूल
  • दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन
  • सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण 3–6 ग्राम दूध के साथ; बला तैल तथा क्षीरबला तैल बाह्य रूप से एवं नस्य में प्रयुक्त।

बला, खरैटी के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीबला, खरैटी
अंग्रेज़ीCountry Mallow
संस्कृतबला, वाट्यालक
बंगालीবেড়েলা
गुजरातीબળા, ખરેટી
मराठीचिकणा
तमिलநிலத்துத்தி
तेलुगुముత్తవ పులగం
कन्नड़ಬಳ
मलयालमകുറുന്തോട്ടി
लैटिन (वानस्पतिक)Sida cordifolia

परिचय

बला (Sida cordifolia) का अर्थ ही है "बल" — यह एक पोषक, वातशामक द्रव्य है जो मांस, स्नायु तथा धातु का बल पुनः बनाने हेतु प्रयुक्त होता है। शीत एवं बृंहण होने से यह बला तैल तथा क्षीरबला जैसे शास्त्रीय बलवर्धक तैलों का प्रधान घटक है।

वर्गीकरण

माल्वेसी (Malvaceae) कुल का यह द्रव्य बल्य (बलवर्धक), बृंहण (पोषक) तथा रसायन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका मधुर रस, स्निग्ध-पिच्छिल गुण एवं शीत वीर्य धातुओं का पोषण करते हैं और वात को शान्त करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

बला का अर्थ है बल, और मूल का प्रयोग वहाँ होता है जहाँ शरीर क्षीण हो चुका हो — ज्वर के पश्चात्, कार्श्य में, वृद्धावस्था में, तथा दौर्बल्य एवं कम्प सहित वात-व्याधियों में। यह बल्य एवं बृंहण द्रव्य है, जो आन्तरिक रूप से दूध के साथ लिया जाता है और स्नायु तथा सन्धियों हेतु क्षीरबला जैसे महान् सिद्ध तैलों में प्रयुक्त होता है।

मांस-दौर्बल्य हेतु बला

नाम ही संकेत बता देता है। बल-हानि का यह शास्त्रोक्त द्रव्य है, चाहे वह रोग के पश्चात् हो, वृद्धावस्था में हो, अथवा जीर्ण वात-व्याधि से।

स्नायु-विकारों हेतु बला

अर्दित, गृध्रसी तथा स्नायुजन्य शूल में प्रयुक्त, प्रायः आन्तरिक सेवन के साथ बाह्य रूप से लगाए जाने वाले सिद्ध तैल के रूप में।

अभ्यंग तैल के रूप में बला

बला तैल सर्वाधिक प्रयुक्त शास्त्रीय वात-तैलों में से एक है, जो जकड़न, शूल तथा क्षय में अभ्यंग हेतु लगाया जाता है।

सन्धि-शूल हेतु बला

केवल वेदनाहर नहीं, अपितु पोषक — वहाँ प्रयुक्त जहाँ सन्धियाँ शूलयुक्त हों और आसपास का ऊतक क्षीण हो।

रोगोत्तर पुनर्लाभ में बला

दीर्घ रोग से उबरते समय का मानक बल्य, जो दूध के साथ लिया जाता है।

हृदय हेतु बला

शास्त्रों में हृद्य कहा गया है, और कुछ हृदय-योगों में इसे संचार-कर्म हेतु नहीं, अपितु बलवर्धक कर्म हेतु सम्मिलित किया जाता है।

क्षीरबला में बला

क्षीरबला तैल का प्रधान द्रव्य, जो दूध के साथ संस्कारित होता है और स्नायु तथा वात-व्याधियों में बाह्य एवं आन्तरिक, दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है।

श्वसन-दौर्बल्य हेतु बला

जीर्ण कास एवं श्वास-कष्ट में वहाँ प्रयुक्त जहाँ मूल चित्र अवरोध का नहीं, अपितु क्षय का हो।

वृष्य द्रव्य के रूप में बला

प्रजनन-बल्य द्रव्यों में नामित, जो इसके सामान्य बल्य वर्गीकरण के अनुरूप है।

मूत्र-विकारों हेतु बला

मूत्र-दाह में तथा मृदु मूत्रल के रूप में प्रयुक्त — यह गौण किन्तु वास्तविक शास्त्रोक्त संकेत है।

मात्रा — कितना लें

मूल चूर्ण 3–6 ग्राम दूध के साथ; बला तैल तथा क्षीरबला तैल बाह्य रूप से एवं नस्य में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

बला, खरैटी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में बला, खरैटी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (बल्य एवं बृंहणीय); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).

चरक संहिता में बला, खरैटी के विषय में क्या कहा गया है?

बलवर्धक द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — बल्य एवं बृंहणीय.

भावप्रकाश निघण्टु में बला, खरैटी के विषय में क्या कहा गया है?

बल्य एवं रसायन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में बला, खरैटी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

बला का अर्थ है बल, और मूल का प्रयोग वहाँ होता है जहाँ शरीर क्षीण हो चुका हो — ज्वर के पश्चात्, कार्श्य में, वृद्धावस्था में, तथा दौर्बल्य एवं कम्प सहित वात-व्याधियों में। यह बल्य एवं बृंहण द्रव्य है, जो आन्तरिक रूप से दूध के साथ लिया जाता है और स्नायु तथा सन्धियों हेतु क्षीरबला जैसे महान् सिद्ध तैलों में प्रयुक्त होता है।

बला, खरैटी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस मधुर, गुण लघु, स्निग्ध, पिच्छिल, वीर्य शीत, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और पित्त का शमन. प्रभाव: बल्य (बलवर्धक), रसायन.

बला, खरैटी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। बला, खरैटी का वीर्य शीत है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और पित्त का शमन.

बला, खरैटी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल.

बला, खरैटी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

मूल चूर्ण 3–6 ग्राम दूध के साथ; बला तैल तथा क्षीरबला तैल बाह्य रूप से एवं नस्य में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

बला, खरैटी का प्रयोग कब वर्जित है?

सामान्यतः अत्यन्त सुरक्षित; औषधीय रूप से ओषधि (बीज नहीं) प्रयुक्त होती है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

बला, खरैटी कहाँ पाया जाता है?

बला भारत के मैदानों में मार्ग-किनारों, बंजर भूमि तथा शुष्क खेतों में उगने वाला छोटा क्षुप है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • चरक संहिता — बल्य एवं बृंहणीय
    बलवर्धक द्रव्यों में उल्लिखित।
  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
    बल्य एवं रसायन के रूप में वर्णित।

Modern research

  1. Phytopharmacological evaluation of ethanol extract of Sida cordifolia L. roots (see source). Asian Pacific Journal of Tropical Biomedicine (2012)

    A pharmacological evaluation reporting analgesic, anti-inflammatory and CNS effects of Sida cordifolia (Bala) root extract.

    View study doi:10.1016/S2221-1691(14)60202-1
  2. Anti-inflammatory, analgesic activity and acute toxicity of Sida cordifolia L. (see source). Journal of Ethnopharmacology (2000)

    A study reporting Sida cordifolia (Bala) extract inhibited carrageenan-induced paw oedema and reduced pain responses in animal models.

    View study doi:10.1016/s0378-8741(00)00205-1

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

सामान्यतः अत्यन्त सुरक्षित; औषधीय रूप से ओषधि (बीज नहीं) प्रयुक्त होती है। गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

बला भारत के मैदानों में मार्ग-किनारों, बंजर भूमि तथा शुष्क खेतों में उगने वाला छोटा क्षुप है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बला किसमें प्रयुक्त होती है?

बला एक बलवर्धक बल्य है, जो मांस-दौर्बल्य, वात-व्याधि, स्नायु-शूल, सन्धि-विकार तथा रोग के पश्चात् पुनर्लाभ में प्रयुक्त होती है। इसे चूर्ण या क्वाथ के रूप में आन्तरिक रूप से तथा शास्त्रोक्त अभ्यंग तैल बला तैल के रूप में बाह्य रूप से, दोनों प्रकार लिया जाता है।

बला की मात्रा क्या है?

मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः दूध के साथ, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। सिद्ध तैल के रूप में यह बाह्य रूप से मात्रा-सीमा के बिना लगाया जाता है। इसे थोड़े समय नहीं, अपितु सप्ताहों तक लिया जाता है।

क्षीरबला तैल क्या है?

एक शास्त्रीय तैल जिसमें बला मूल को दूध तथा तिल तैल के साथ अनेक बार संस्कारित किया जाता है। यह स्नायु एवं वात-व्याधियों में प्रयुक्त होता है, बाह्य रूप से लगाया जाता है और कभी-कभी क्षीरबला 101 के रूप में अत्यल्प मात्रा में आन्तरिक रूप से भी दिया जाता है।

क्या बला में एफ़ेड्रिन होता है?

Sida cordifolia में स्वाभाविक रूप से अल्प मात्रा में एफ़ेड्रिन होता है, इसीलिए कुछ देशों में इसे अनुपूरक घटक के रूप में प्रतिबन्धित अथवा सीमित किया गया है। यदि आप इसे लेकर यात्रा कर रहे हों अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भेज रहे हों तो यह एक वास्तविक नियामक विचार है।

बला किसे नहीं लेनी चाहिए?

उच्च रक्तचाप, हृदय-गति की अनियमितता अथवा चिन्ता-विकार वाले व्यक्ति एफ़ेड्रिन की मात्रा के कारण पहले चिकित्सकीय परामर्श लें। गर्भावस्था में वर्जित। बिना परामर्श इसे उत्तेजक औषधियों अथवा रक्तचाप की औषधि के साथ न लें।

बला को हिन्दी में क्या कहते हैं?

खरैटी अथवा बरियार। अंग्रेज़ी में इसे कभी-कभी कंट्री मैलो अथवा हार्ट-लीव्ड सिडा कहा जाता है। Sida की अनेक जातियाँ एक साथ व्यापार में आती हैं, अतः यदि किसी नुस्खे में विशेष जाति निर्दिष्ट हो तो वानस्पतिक नाम अवश्य देखें।

क्या बला बालकों को दी जा सकती है?

बला तैल भारत के अधिकांश भागों में शिशु-अभ्यंग हेतु परम्परागत रूप से प्रयुक्त होता है और यह बाह्य प्रयोग भली-भाँति स्थापित है। बालकों में आन्तरिक प्रयोग वयस्क मात्रा से अनुमान लगाकर नहीं, अपितु चिकित्सक द्वारा निर्धारित होना चाहिए।

Consult a registered BAMS Vaidya Consult Us