कटेरी, भटकटैया (Solanum virginianum) — whole plant
कटेरी, भटकटैया — Solanum virginianum. प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग.
चित्र: Dr.S.Soundarapandian / Wikimedia Commons, Public domain
आयुर्वेदीय द्रव्य

कटेरी, भटकटैया कण्टकारी

Solanum virginianum · Solanaceae

अन्य नाम: Solanum xanthocarpum, कटेली, भटकटैया

प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग

कण्टकारी (Solanum virginianum) पीले फल वाली कटेली है, एक कण्टकयुक्त ओषधि जो दशमूल के दस मूलों में से एक है। आयुर्वेद इसके पञ्चाङ्ग को कास, श्वास तथा ज्वर में प्रयुक्त करता है, और शास्त्रों में यह सर्वाधिक प्रयुक्त श्वसन-द्रव्यों में है।

कटेरी, भटकटैया — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावकासहर, Shwasahara

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Solanum virginianum
  • प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: पञ्चाङ्ग चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; श्वसन एवं दशमूल योगों का प्रमुख घटक।

कटेरी, भटकटैया के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीकटेरी, भटकटैया
अंग्रेज़ीYellow-berried Nightshade
संस्कृतकण्टकारी, निदिग्धिका
बंगालीকণ্টকারী
गुजरातीભોંયરીંગણી
मराठीरिंगणी
तमिलகண்டங்கத்திரி
तेलुगुనేలములక
कन्नड़ನೆಲಗುಳ್ಳ
मलयालमകണ്ടകാരിചുണ്ട
लैटिन (वानस्पतिक)Solanum virginianum

परिचय

कण्टकारी (Solanum virginianum) एक कण्टकयुक्त, नीची ओषधि तथा दशमूल की सदस्या है — आयुर्वेद के प्रमुख श्वसन-उपायों में से एक, जो कास, श्वास एवं ज्वर में प्रयुक्त होती है।

वर्गीकरण

सोलेनेसी (Solanaceae) कुल की कण्टकारी कासहर तथा श्वासहर द्रव्यों में वर्गीकृत है, और दशमूल के दस मूलों में से एक है। इसका तिक्त-कटु रस एवं उष्ण वीर्य उर से कफ का हरण करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

कण्टकारी एक श्वसन-द्रव्य है, जो कास, श्वास तथा उरःअवरोध में वहाँ प्रयुक्त होती है जहाँ कफ घना हो और कठिनाई से निकले। दशमूल के दस मूलों में से एक होने के साथ यह कास-युक्त ज्वर में भी दी जाती है, और प्रायः अपनी बड़ी सहचरी बृहती के साथ जोड़ी जाती है।

कास हेतु कण्टकारी

एक प्रधान कासहर द्रव्य, जो शुष्क तथा सकफ, दोनों प्रकार की कास में प्रयुक्त होता है — सर्वाधिक विश्वसनीय रूप से निर्दिष्ट श्वसन-द्रव्यों में से एक।

श्वास हेतु कण्टकारी

समस्त शास्त्रों में श्वास में नामित; श्वास-कष्ट तथा श्वास-मार्ग की जकड़न दूर करने हेतु प्रयुक्त।

दशमूल में कण्टकारी

लघु पञ्चमूल के पाँच छोटे मूलों में से एक।

ज्वर हेतु कण्टकारी

श्वसन-संलिप्तता वाले ज्वर में प्रयुक्त; यह शास्त्रीय ज्वर-क्वाथों का अंग है।

स्वरभेद हेतु कण्टकारी

कर्कश अथवा बैठे स्वर में प्रयुक्त, जो मधु के साथ क्वाथ रूप में लिया जाता है।

उरःअवरोध हेतु कण्टकारी

इसका उष्ण, रूक्ष स्वभाव घने कफ को पतला करता है और निष्ठीवन सरल बनाता है।

कृमि हेतु कण्टकारी

कृमिघ्न द्रव्यों में नामित।

मूत्र-विकारों हेतु कण्टकारी

अल्प एवं कष्टयुक्त मूत्रता में प्रयुक्त मृदु मूत्रल द्रव्य।

दन्तशूल हेतु कण्टकारी

बीज का धूम पारम्परिक स्थानिक उपाय है, यद्यपि सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं।

कण्टकारी अवलेह में कण्टकारी

शास्त्रीय श्वसन अवलेह का प्रधान द्रव्य, तथा दशमूलारिष्ट एवं अधिकांश कास-योगों में उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

पञ्चाङ्ग चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; श्वसन एवं दशमूल योगों का प्रमुख घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

कटेरी, भटकटैया का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में कटेरी, भटकटैया के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (कास-श्वास एवं Dashamula); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).

चरक संहिता में कटेरी, भटकटैया के विषय में क्या कहा गया है?

कास एवं श्वास हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — कास-श्वास एवं Dashamula.

भावप्रकाश निघण्टु में कटेरी, भटकटैया के विषय में क्या कहा गया है?

कासहर के रूप में वर्णित; दशमूल का घटक। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में कटेरी, भटकटैया किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

कण्टकारी एक श्वसन-द्रव्य है, जो कास, श्वास तथा उरःअवरोध में वहाँ प्रयुक्त होती है जहाँ कफ घना हो और कठिनाई से निकले। दशमूल के दस मूलों में से एक होने के साथ यह कास-युक्त ज्वर में भी दी जाती है, और प्रायः अपनी बड़ी सहचरी बृहती के साथ जोड़ी जाती है।

कटेरी, भटकटैया के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: कासहर, Shwasahara.

कटेरी, भटकटैया को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। कटेरी, भटकटैया का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

कटेरी, भटकटैया का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: पञ्चाङ्ग.

कटेरी, भटकटैया की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

पञ्चाङ्ग चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; श्वसन एवं दशमूल योगों का प्रमुख घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

कटेरी, भटकटैया का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

कटेरी, भटकटैया कहाँ पाया जाता है?

कण्टकारी भारत के मैदानों में शुष्क बंजर भूमि तथा मार्ग-किनारों पर फैलने वाली कण्टकयुक्त ओषधि है।

कटेरी, भटकटैया किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?

Dashamula.

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
    कासहर के रूप में वर्णित; दशमूल का घटक।
  • चरक संहिता — कास-श्वास एवं Dashamula
    कास एवं श्वास हेतु उल्लिखित।

Modern research

  1. Evaluation of anti-inflammatory activity of Solanum xanthocarpum Schrad and Wendl (Kantakari) extract in laboratory animals (see source). (2014)

    An experimental study reporting significant anti-inflammatory activity of Solanum xanthocarpum (Kantakari) extract.

    View study doi:10.4103/0257-7941.131976
  2. Further studies on the clinical efficacy of Solanum xanthocarpum and Solanum trilobatum in bronchial asthma (see source). Phytotherapy Research (2005)

    A clinical study reporting Solanum xanthocarpum (Kantakari) improved pulmonary function and reduced cough, breathlessness and sputum in asthmatic subjects.

    View study doi:10.1002/ptr.1555

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

कण्टकारी भारत के मैदानों में शुष्क बंजर भूमि तथा मार्ग-किनारों पर फैलने वाली कण्टकयुक्त ओषधि है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कण्टकारी किसमें प्रयुक्त होती है?

कण्टकारी आयुर्वेद के प्रधान श्वसन-द्रव्यों में से एक है, जो कास, श्वास, उरःअवरोध, स्वरभेद तथा श्वसन-संलिप्त ज्वर में प्रयुक्त होती है। यह दशमूल के दस मूलों में से भी एक है।

कण्टकारी की मात्रा क्या है?

पञ्चाङ्ग चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार, प्रायः मधु के साथ। कण्टकारी अवलेह के रूप में एक से दो चम्मच दिन में दो बार।

क्या कण्टकारी श्वास में अच्छी है?

यह शास्त्रोक्त श्वासहर द्रव्य है जो समस्त ग्रन्थों में श्वास एवं श्वास-कष्ट हेतु प्रयुक्त होता है, और अधिकांश आयुर्वेदीय श्वसन-योगों में सम्मिलित रहता है। यह सहायक है — श्वास को उचित निदान चाहिए और निर्धारित इन्हेलर नहीं रोकने चाहिए।

कण्टकारी को हिन्दी में क्या कहते हैं?

कटेली अथवा भटकटैया। अंग्रेज़ी में येलो-बेरीड नाइटशेड। वानस्पतिक नाम Solanum surattense तथा Solanum xanthocarpum से संशोधित है, और पुराने स्रोत दोनों प्रयुक्त करते हैं।

कण्टकारी और बृहती में क्या अन्तर है?

दोनों दशमूल की Solanum जातियाँ हैं और कास हेतु समान रूप से प्रयुक्त होती हैं। कण्टकारी छोटी, कण्टकयुक्त, पीले फल वाली Solanum virginianum है; बृहती बड़ी Solanum indicum है। दोनों प्रायः बृहत्यादि के रूप में साथ निर्दिष्ट होती हैं।

क्या कण्टकारी के दुष्प्रभाव हैं?

शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। यह सोलेनेसी कुल की है, अतः इस कुल के प्रति ज्ञात संवेदनशीलता वाले व्यक्ति सावधानी बरतें। गर्भावस्था में वर्जित। वनस्पति अत्यन्त कण्टकयुक्त है और ताज़े द्रव्य को सावधानी से सँभालना चाहिए।

क्या कण्टकारी बालकों को दी जा सकती है?

यह बाल-कास योगों में प्रयुक्त होती है, किन्तु मात्रा वयस्क मात्रा घटाकर नहीं, अपितु चिकित्सक द्वारा निर्धारित होनी चाहिए।

इनका घटक: Dashamula

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