दालचीनी (Cinnamomum verum) — bark
दालचीनी — Cinnamomum verum. प्रयोज्य अंग: त्वक्.
चित्र: VASANTH S.N. / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

दालचीनी त्वक्

Cinnamomum verum · Lauraceae

अन्य नाम: दालचीनी, त्वक्, सिनेमन, दालचीनी की छाल

प्रयोज्य अंग: त्वक्

त्वक् (Cinnamomum verum) असली दालचीनी है, श्रीलंकाई वृक्ष की अन्तःछाल तथा चतुर्जात के चार सुगन्धित द्रव्यों में से एक। यह उष्ण एवं पाचक है, जो अरुचि, कास, उत्क्लेश तथा रक्त-शर्करा में प्रयुक्त होती है, और कैसिया से भिन्न है — वह मोटी, सस्ती छाल जो अधिकांश बाज़ारों में दालचीनी के नाम से बिकती है।

दालचीनी — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु, तिक्त, मधुर
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावदीपन, सुगन्धित

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Cinnamomum verum
  • प्रयोज्य अंग: त्वक्
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: छाल-चूर्ण 0.5–2 ग्राम; पाचन तथा श्वसन योगों (त्रिजातक, सितोपलादि) का सामान्य अंग।

दालचीनी के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीदालचीनी
अंग्रेज़ीCinnamon
संस्कृतत्वक्, दारुसिता
बंगालीদারচিনি
गुजरातीતજ
मराठीदालचिनी
तमिलஇலவங்கப்பட்டை
तेलुगुదాల్చిన చెక్క
कन्नड़ದಾಲ್ಚಿನ್ನಿ
लैटिन (वानस्पतिक)Cinnamomum verum

परिचय

त्वक् (दालचीनी, Cinnamomum verum) एक उष्ण, मधुर-कटु छाल है जो पाचन, रक्त-संचरण तथा श्वसन-मार्ग हेतु प्रयुक्त होती है। एक प्रिय रसोई-मसाला होने के साथ यह एक शास्त्रीय कफ-हर द्रव्य भी है।

वर्गीकरण

लॉरेसी (Lauraceae) कुल की त्वक् दीपन तथा सुगन्धित कफ-वात शामक द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका उष्ण, भेदक गुण पाचन प्रदीप्त करता है और कफ का हरण करता है।

उपयोग एवं लाभ

दालचीनी एक उष्ण सुगन्धित द्रव्य है जो अरुचि, आध्मान तथा शीतजन्य अवरोध में, और हाथ-पैर शीत रहने पर रक्त-संचरण सुधारने हेतु प्रयुक्त होती है। त्रिजातक समूह का एक अंग होकर इसे गुरु योगों में स्वादिष्टता तथा उनके पाचन को सहारा देने हेतु मिलाया जाता है।

पाचन हेतु त्वक्

अरुचि, आध्मान तथा उत्क्लेश में प्रयुक्त एक दीपन एवं पाचन द्रव्य।

रक्त-शर्करा हेतु त्वक्

प्रमेहहर द्रव्यों में नामित, और दालचीनी-कुल पर ग्लूकोज़-नियन्त्रण सम्बन्धी सार्थक आधुनिक अनुसन्धान है।

कास हेतु त्वक्

उष्ण एवं सुगन्धित होने से अवरोध सहित कफज कास में मधु के साथ प्रयुक्त।

चतुर्जात में त्वक्

एला, तेजपत्ता एवं नागकेसर के साथ चार सुगन्धित द्रव्यों में से एक, जो स्वाद तथा अवशोषण हेतु मिलाया जाता है।

मुख-दुर्गन्ध हेतु त्वक्

अपनी सुगन्ध तथा सूक्ष्मजीव-रोधी कर्म हेतु मुख-शोधकों एवं मुख-कल्पों में प्रयुक्त।

उत्क्लेश हेतु त्वक्

एला तथा शुण्ठी के साथ प्रयुक्त एक शास्त्रीय छर्दिघ्न द्रव्य।

हृदय हेतु त्वक्

हृद्य कही गई है और कुछ हृदय-योगों में उपस्थित रहती है।

मूत्र-विकारों हेतु त्वक्

चन्द्रप्रभा वटी जैसे योगों के भीतर मूत्रदाह में प्रयुक्त।

त्वचा हेतु त्वक्

कवकीय संक्रमण तथा युवान-पिटिका हेतु कुछ बाह्य कल्पों में लगाई जाती है।

शास्त्रीय योगों में त्वक्

सितोपलादि चूर्ण, तालीसादि चूर्ण तथा चतुर्जात धारण करने वाले बड़े भाग के योगों में उपस्थित।

मात्रा — कितना लें

छाल-चूर्ण 0.5–2 ग्राम; पाचन तथा श्वसन योगों (त्रिजातक, सितोपलादि) का सामान्य अंग। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

दालचीनी का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में दालचीनी के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Sitopaladi / Trijataka).

भावप्रकाश निघण्टु में दालचीनी के विषय में क्या कहा गया है?

दीपन एवं सुगन्धित के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग.

शार्ङ्गधर संहिता में दालचीनी के विषय में क्या कहा गया है?

कास तथा पाचन हेतु एक शास्त्रीय घटक। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Sitopaladi / Trijataka.

आयुर्वेद में दालचीनी किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

दालचीनी एक उष्ण सुगन्धित द्रव्य है जो अरुचि, आध्मान तथा शीतजन्य अवरोध में, और हाथ-पैर शीत रहने पर रक्त-संचरण सुधारने हेतु प्रयुक्त होती है। त्रिजातक समूह का एक अंग होकर इसे गुरु योगों में स्वादिष्टता तथा उनके पाचन को सहारा देने हेतु मिलाया जाता है।

दालचीनी के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, तिक्त, मधुर, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: दीपन, सुगन्धित.

दालचीनी को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। दालचीनी का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

दालचीनी का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: त्वक्.

दालचीनी की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

छाल-चूर्ण 0.5–2 ग्राम; पाचन तथा श्वसन योगों (त्रिजातक, सितोपलादि) का सामान्य अंग। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

दालचीनी का प्रयोग कब वर्जित है?

आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; बड़ी चिकित्सकीय मात्रा संयम से प्रयुक्त।

दालचीनी कहाँ पाया जाता है?

दालचीनी श्रीलंका तथा दक्षिण भारत की मूल सदाबहार वृक्ष है, जिसकी अन्तःछाल निकालकर नलिकाओं में सुखाई जाती है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग
    दीपन एवं सुगन्धित के रूप में वर्णित।
  • शार्ङ्गधर संहिता — Sitopaladi / Trijataka
    कास तथा पाचन हेतु एक शास्त्रीय घटक।

Modern research

  1. Cinnamon Use in Type 2 Diabetes: An Updated Systematic Review and Meta-Analysis Allen RW, et al.. Annals of Family Medicine (2013)

    A meta-analysis of RCTs finding cinnamon lowered fasting glucose, total and LDL cholesterol and triglycerides in type 2 diabetes.

    View study doi:10.1370/afm.1517
  2. Cinnamon in glycaemic control: Systematic review and meta-analysis (see source). Clinical Nutrition (2012)

    A systematic review and meta-analysis assessing cinnamon's effect on glycaemic control in diabetes.

    View study doi:10.1016/j.clnu.2012.04.003

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

आहारीय मसाले के रूप में सुरक्षित; बड़ी चिकित्सकीय मात्रा संयम से प्रयुक्त।

प्राप्ति स्थान

दालचीनी श्रीलंका तथा दक्षिण भारत की मूल सदाबहार वृक्ष है, जिसकी अन्तःछाल निकालकर नलिकाओं में सुखाई जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीलोन दालचीनी तथा कैसिया में क्या अन्तर है?

सीलोन दालचीनी (Cinnamomum verum) पतली, काग़ज़-सदृश, परतदार तथा मृदु है — शास्त्रों की असली दालचीनी। कैसिया मोटी, कठोर, एकहरी मुड़ी हुई तथा तीव्र होती है, और अधिकांश बाज़ार उसी को दालचीनी के नाम से बेचते हैं। कैसिया में कूमारिन बहुत अधिक होता है।

कूमारिन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

कैसिया में पर्याप्त अधिक कूमारिन होता है, जो मात्रा में यकृत हेतु विषैला है। यदि रक्त-शर्करा हेतु प्रतिदिन दालचीनी लेते हों तो सीलोन दालचीनी प्रयोग करें — कैसिया की दैनिक सह्य मात्रा अल्प है, और एक भरा चम्मच उसे सरलता से पार कर देता है।

त्वक् की मात्रा क्या है?

छाल-चूर्ण प्रतिदिन 1–3 ग्राम। इसे चिकित्सकीय मात्रा में अकेले लेने की अपेक्षा योगों के भीतर सहायक द्रव्य के रूप में अधिक प्रयुक्त किया जाता है। सीलोन दालचीनी की पाक-मात्रा हेतु कोई सीमा आवश्यक नहीं।

क्या दालचीनी प्रमेह में सहायक है?

मध्यम रक्त-शर्करा सुधार पर उचित आधुनिक अनुसन्धान है, और यह शास्त्रीय प्रमेहहर द्रव्यों में नामित है। इसे सहायक मानें — मापन जारी रखें, अपने चिकित्सक को बताएँ, और दैनिक प्रयोग हेतु कैसिया के स्थान पर सीलोन ही लें।

त्वक् को हिन्दी में क्या कहते हैं?

दालचीनी। अंग्रेज़ी में ट्रू सिनेमन अथवा सीलोन सिनेमन। ध्यान दें कि बाज़ार में दालचीनी का अर्थ प्रायः कैसिया होता है, अतः विशेष रूप से Cinnamomum verum चाहिए तो वानस्पतिक नाम अवश्य देखें।

क्या दालचीनी के दुष्प्रभाव हैं?

सामान्य मात्रा में सीलोन दालचीनी अत्यन्त सुरक्षित है। कैसिया प्रतिदिन मात्रा में लेने पर कूमारिन से यकृत-क्षति का संकट है। प्रमेह की औषधि अथवा रक्त पतला करने वाली औषधि लेते हों तो परामर्श लें, और शल्य-क्रिया से पूर्व सेवन रोक दें।

चतुर्जात क्या है?

एक साथ प्रयुक्त चार सुगन्धित द्रव्य — एला, त्वक्, तेजपत्ता तथा नागकेसर — जो स्वाद, अवशोषण तथा कफ-हर कर्म सुधारने हेतु शास्त्रीय योगों में मिलाए जाते हैं।

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