रास्ना रास्ना
Pluchea lanceolata · Asteraceae
अन्य नाम: रायसन, रास्ना
प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल
रास्ना (Pluchea lanceolata) आयुर्वेद का शास्त्रीय सन्धिवात-हर द्रव्य है, जिसे समस्त ग्रन्थों ने आमवात — आमवातिक सन्धिशोथ — का प्रमुखतम द्रव्य कहा है। यह महारास्नादि क्वाथ का प्रधान घटक है, जो सन्धि-शूल एवं जकड़न हेतु सर्वाधिक निर्दिष्ट आयुर्वेदीय कल्पों में से एक है।
| रस | तिक्त |
|---|---|
| गुण | गुरु |
| वीर्य | उष्ण |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | वात और कफ का शमन |
| प्रभाव | शोथहर, शोथहर |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Pluchea lanceolata
- प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल
- दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: पत्र/मूल चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; महारास्नादि क्वाथ तथा रास्नादि योगों का प्रधान द्रव्य।
रास्ना के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
रास्ना (Pluchea lanceolata) एक उष्ण, शोथहर द्रव्य है जो सन्धियों एवं स्नायुओं को समर्पित है। यह सन्धिवात, गृध्रसी तथा वात-व्याधियों का शास्त्रीय उपाय है, और रास्नादि योगों का प्रधान द्रव्य।
वर्गीकरण
एस्टरेसी (Asteraceae) कुल की रास्ना वातशामक, शोथहर द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त रस, गुरु गुण एवं उष्ण वीर्य आम का हरण करते हैं और वातजन्य शूल एवं शोथ को शान्त करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
रास्ना आमवात — जकड़न एवं शोथ सहित आमवातिक शूल — का विशिष्ट द्रव्य है। यह सन्धिवात, गृध्रसी तथा कटिशूल में प्रयुक्त होती है, और महारास्नादि क्वाथ का प्रधान द्रव्य है, जो सन्धियों एवं स्नायुओं की वात-व्याधियों हेतु शास्त्रीय क्वाथ है।
आमवात हेतु रास्ना
शास्त्रोक्त आमवात द्रव्य, जिसे ग्रन्थों ने पाचन-विकार सहित शूलयुक्त, जकड़ी, सूजी सन्धियों का प्रधान उपाय कहा है।
सामान्य सन्धि-शूल हेतु रास्ना
अस्थिसन्धिशोथ, कटिशूल तथा जकड़न में प्रयुक्त, और महारास्नादि क्वाथ का प्रधान द्रव्य।
गृध्रसी हेतु रास्ना
गृध्रसी में नामित, जो आन्तरिक रूप से ली जाती है तथा सिद्ध तैलों में प्रयुक्त होती है।
आम हेतु रास्ना
एक आमपाचन द्रव्य — यह उस अपक्व शेष का हरण करती है जिसे शास्त्र शोथयुक्त सन्धि-रोग का कारण मानते हैं।
शोथ हेतु रास्ना
एक शोथहर द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ सन्धियाँ शूलयुक्त होने के साथ सूजी भी हों।
कास एवं श्वास हेतु रास्ना
एक गौण संकेत, जो अवरोध सहित श्वसन-विकारों में प्रयुक्त होता है।
पाचन हेतु रास्ना
दीपन, अरुचि में प्रयुक्त — यह प्रासंगिक है क्योंकि आमवात को सन्धि-रोग जितना ही पाचन-विकार माना जाता है।
बाह्य रूप से रास्ना
पत्र-कल्क शूलयुक्त सन्धियों पर लगाया जाता है, और यह द्रव्य शास्त्रीय शूल-तैलों में सम्मिलित रहता है।
ज्वर हेतु रास्ना
अङ्गमर्द सहित ज्वर में शास्त्रीय ज्वर-क्वाथों के भीतर प्रयुक्त।
महारास्नादि क्वाथ में रास्ना
शास्त्रीय सन्धि-क्वाथ का प्रधान द्रव्य, तथा रास्नादि गुग्गुलु एवं अधिकांश सन्धिवात-हर योगों में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
पत्र/मूल चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; महारास्नादि क्वाथ तथा रास्नादि योगों का प्रधान द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
रास्ना का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में रास्ना के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग); शार्ङ्गधर संहिता (Maha Rasnadi Kwath).
भावप्रकाश निघण्टु में रास्ना के विषय में क्या कहा गया है?
वातशामक एवं शोथहर के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
शार्ङ्गधर संहिता में रास्ना के विषय में क्या कहा गया है?
शास्त्रीय सन्धि-क्वाथ का प्रधान द्रव्य। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Maha Rasnadi Kwath.
आयुर्वेद में रास्ना किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
रास्ना आमवात — जकड़न एवं शोथ सहित आमवातिक शूल — का विशिष्ट द्रव्य है। यह सन्धिवात, गृध्रसी तथा कटिशूल में प्रयुक्त होती है, और महारास्नादि क्वाथ का प्रधान द्रव्य है, जो सन्धियों एवं स्नायुओं की वात-व्याधियों हेतु शास्त्रीय क्वाथ है।
रास्ना के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, गुण गुरु, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: शोथहर, शोथहर.
रास्ना को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। रास्ना का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.
रास्ना का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: पत्र, मूल.
रास्ना की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
पत्र/मूल चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; महारास्नादि क्वाथ तथा रास्नादि योगों का प्रधान द्रव्य। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
रास्ना का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
रास्ना कहाँ पाया जाता है?
रास्ना उत्तर एवं मध्य भारत के शुष्क मैदानों तथा बंजर भूमि में फैलने वाला उपक्षुप है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- शार्ङ्गधर संहिता — Maha Rasnadi Kwath
शास्त्रीय सन्धि-क्वाथ का प्रधान द्रव्य। - भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
वातशामक एवं शोथहर के रूप में वर्णित।
Modern research
-
Pluchea lanceolata (Rasana): Chemical and biological potential of a Rasayana herb used in the traditional system of medicine
(see source). Fitoterapia (2012)
A review of Pluchea lanceolata (Rasna) documenting its anti-inflammatory, antiarthritic and analgesic pharmacology, mediated by triterpenoids.
View study doi:10.1016/j.fitote.2012.07.008
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
रास्ना उत्तर एवं मध्य भारत के शुष्क मैदानों तथा बंजर भूमि में फैलने वाला उपक्षुप है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रास्ना किसमें प्रयुक्त होती है?
सर्वोपरि सन्धि-शूल एवं जकड़न में, विशेषतः आमवात में। यह शास्त्रीय सन्धिवात-हर द्रव्य है और महारास्नादि क्वाथ का प्रधान घटक, जो सर्वाधिक निर्दिष्ट आयुर्वेदीय सन्धि-कल्पों में से एक है।
रास्ना की मात्रा क्या है?
मूल अथवा पत्र चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। महारास्नादि क्वाथ के रूप में प्रायः 15–30 मिली समान मात्रा जल के साथ, भोजन से पूर्व दिन में दो बार।
आमवात क्या है?
वह शास्त्रीय संज्ञा जो अधिकांशतः आमवातिक सन्धिशोथ से मेल खाती है — शूलयुक्त, जकड़ी, सूजी सन्धियाँ, साथ में पाचन-विकार तथा लिप्त जिह्वा। आयुर्वेद इसे ऐसा पाचन-विकार मानता है जो सन्धियों में प्रकट होता है, इसीलिए रास्ना दीपन भी है और शोथहर भी।
रास्ना से सन्धि-शूल में लाभ दिखने में कितना समय लगता है?
आँकने से पूर्व चार से आठ सप्ताह का नियमित प्रयोग। शास्त्रीय परम्परा में जीर्ण सन्धि-अवस्थाओं पर तीन से छह मास तक कार्य किया जाता है, आहार-परिवर्तन के साथ — आमवात-चिकित्सा सदैव पाचन को भी सम्बोधित करती है।
क्या रास्ना Alpinia galanga ही है?
यह वास्तविक भ्रम का बिन्दु है। उत्तर भारत में रास्ना प्रायः Pluchea lanceolata होती है; दक्षिण भारत तथा केरल में उसके स्थान पर प्रायः Alpinia galanga प्रयुक्त होती है। दोनों सन्धि-शूल में प्रयुक्त होती हैं। नुस्खे में कौन-सा वानस्पतिक अभीष्ट है, यह देखें।
क्या रास्ना के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। यह तिक्त एवं उष्ण है, अतः अधिक मात्रा में पित्त बढ़ा सकती है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें।
क्या रास्ना प्रचलित सन्धिवात औषधि के साथ ली जा सकती है?
यह सामान्यतः साथ प्रयुक्त होती है, किन्तु अपने आमवात-रोग विशेषज्ञ को बताएँ। आमवातिक सन्धिशोथ की निर्धारित रोग-परिवर्तक औषधियाँ किसी द्रव्य हेतु न रोकें — अनुपचारित RA में सन्धि-क्षति स्थायी होती है और शीघ्रता से बढ़ती है।