चित्रक (Plumbago zeylanica) — root
चित्रक — Plumbago zeylanica. प्रयोज्य अंग: मूल.
चित्र: Lalithamba from India / Wikimedia Commons, CC BY 2.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

चित्रक चित्रक

Plumbago zeylanica · Plumbaginaceae

अन्य नाम: चित्रक, चित्रक मूल, चित्रक मूल छाल

प्रयोज्य अंग: मूल

चित्रक (Plumbago zeylanica) एक क्षुप है जिसका मूल आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रबल पाचक उत्तेजक है। शास्त्र इसे प्रमुखतम दीपन द्रव्य कहते हैं — वह जो जठराग्नि को सर्वाधिक प्रबलता से प्रदीप्त करे। यह अत्यन्त क्षीण अग्नि, अर्श तथा शोथ में प्रयुक्त होता है, और इतना तीक्ष्ण है कि प्रयोग से पूर्व शोधन अपेक्षित है।

चित्रक — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मवात और कफ का शमन
प्रभावदीपन, Agni-kindler

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Plumbago zeylanica
  • प्रयोज्य अंग: मूल
  • दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
  • सामान्य मात्रा: शोधित मूल चूर्ण 0.5–1 ग्राम, योगों के भीतर; अधिक मात्रा में स्वयं-प्रयोग हेतु नहीं।

चित्रक के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीचित्रक
अंग्रेज़ीCeylon Leadwort
संस्कृतचित्रक, अग्नि
बंगालीচিতা
गुजरातीચિત્રો
मराठीचित्रक
तमिलசித்திரமூலம்
तेलुगुచిత్రమూలం
कन्नड़ಚಿತ್ರಮೂಲ
मलयालमകൊടുവേലി
लैटिन (वानस्पतिक)Plumbago zeylanica

परिचय

चित्रक (Plumbago zeylanica) आयुर्वेद का प्रमुखतम अग्निदीपक द्रव्य है — इसका मूल जठराग्नि का सर्वाधिक प्रबल शास्त्रीय उत्तेजक है, जो मन्दाग्नि, आम तथा चयापचय की शिथिलता में प्रयुक्त होता है।

वर्गीकरण

प्लम्बेजिनेसी (Plumbaginaceae) कुल का चित्रक दीपन (अग्निदीपक) द्रव्यों का नेतृत्व करता है। इसका कटु रस, तीक्ष्ण भेदक गुण एवं प्रबल उष्ण वीर्य आम को दग्ध करते हैं और वात-कफ का हरण करते हैं; यह चित्रकादि वटी का आधार है।

उपयोग एवं लाभ

चित्रक दीपन द्रव्यों में सर्वाधिक प्रबल है — शास्त्र इसे अग्नि का प्रदीपक कहते हैं। यह अरुचि, मन्द पाचन तथा उदर-गौरव में, और अर्श में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ पाचन ही मूल समस्या हो। तीक्ष्ण उष्ण होने के कारण यह अल्प मात्रा में और विरले ही अकेले प्रयुक्त होता है।

जठराग्नि हेतु चित्रक

समस्त द्रव्यों में सर्वोपरि शास्त्रोक्त अग्निदीपन द्रव्य। वहाँ प्रयुक्त जहाँ अग्नि एवं पाचन केवल मन्द न होकर ठप हो गए हों।

अर्श हेतु चित्रक

प्रधान अर्श-द्रव्य, चित्रकादि वटी का प्रमुख घटक, जो इस अवस्था के मूल में स्थित मन्द पाचन को सम्बोधित करता है।

शोथ हेतु चित्रक

शोथ में नामित; वहाँ प्रयुक्त जहाँ दुर्बल पाचन के साथ जल-संचय हो।

प्लीहा एवं यकृत्-वृद्धि हेतु चित्रक

प्लीहा एवं यकृत् की वृद्धि में प्रयुक्त, सदैव योगों के भीतर तथा अल्प मात्रा में।

कृमि हेतु चित्रक

एक कृमिघ्न द्रव्य, जिसकी तीक्ष्णता ही आन्त्र-कृमियों के निष्कासन का पारम्परिक आधार है।

त्वचा-रोग हेतु चित्रक

जीर्ण त्वचा-विकारों तथा श्वित्र में बाह्य रूप से लगाया जाता है — मूल का कल्क प्रतिक्षोभक है और सावधानी से प्रयुक्त होना चाहिए।

आमवात हेतु चित्रक

आमवात में प्रयुक्त, जहाँ इसकी उष्णता जकड़न सहित शूल तथा मन्द पाचन, दोनों की ओर निर्दिष्ट होती है।

पञ्चकोल में चित्रक

पाँच कटु पाचक द्रव्यों में से एक, जो उस वर्ग में सर्वाधिक प्रबल दीपन कर्म का योगदान करता है।

अवशोषण हेतु चित्रक

अपने साथ के द्रव्यों के अवशोषण को सुधारता है, इसीलिए यह इतने अधिक योगों में सम्मिलित रहता है।

चित्रकादि वटी में चित्रक

अग्नि, आध्मान तथा अनियमित कोष्ठ हेतु प्रयुक्त शास्त्रीय पाचक वटी का प्रधान द्रव्य।

मात्रा — कितना लें

शोधित मूल चूर्ण 0.5–1 ग्राम, योगों के भीतर; अधिक मात्रा में स्वयं-प्रयोग हेतु नहीं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

चित्रक का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में चित्रक के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (दीपनीय प्रकरण); शार्ङ्गधर संहिता (Chitrakadi Vati).

चरक संहिता में चित्रक के विषय में क्या कहा गया है?

प्रबलतम अग्निदीपकों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — दीपनीय प्रकरण.

शार्ङ्गधर संहिता में चित्रक के विषय में क्या कहा गया है?

शास्त्रीय पाचक योग का आधार। सन्दर्भ: शार्ङ्गधर संहिता — Chitrakadi Vati.

आयुर्वेद में चित्रक किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

चित्रक दीपन द्रव्यों में सर्वाधिक प्रबल है — शास्त्र इसे अग्नि का प्रदीपक कहते हैं। यह अरुचि, मन्द पाचन तथा उदर-गौरव में, और अर्श में वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ पाचन ही मूल समस्या हो। तीक्ष्ण उष्ण होने के कारण यह अल्प मात्रा में और विरले ही अकेले प्रयुक्त होता है।

चित्रक के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: दीपन, Agni-kindler.

चित्रक को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। चित्रक का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.

चित्रक का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल.

चित्रक की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

शोधित मूल चूर्ण 0.5–1 ग्राम, योगों के भीतर; अधिक मात्रा में स्वयं-प्रयोग हेतु नहीं। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

चित्रक का प्रयोग कब वर्जित है?

तीक्ष्ण एवं उष्ण; केवल अल्प, शोधित मात्रा में प्रयोग करें। गर्भावस्था, उच्च पित्त, व्रण तथा रक्तस्राव में वर्जित। निर्देशन में ही प्रयोग करें।

चित्रक कहाँ पाया जाता है?

चित्रक पतली शाखाओं वाला बहुवर्षीय क्षुप है, जो भारत के मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में मिलता है और उद्यानों में उगाया जाता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • शार्ङ्गधर संहिता — Chitrakadi Vati
    शास्त्रीय पाचक योग का आधार।
  • चरक संहिता — दीपनीय प्रकरण
    प्रबलतम अग्निदीपकों में उल्लिखित।

Modern research

  1. Phytochemistry and pharmacological studies of Plumbago zeylanica L.: a medicinal plant review (see source). Clinical Phytoscience (2021)

    A review of Plumbago zeylanica (Chitraka) documenting its digestive-stimulant, anti-inflammatory, antimicrobial and plumbagin-related pharmacology.

    View study doi:10.1186/s40816-021-00271-7

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

तीक्ष्ण एवं उष्ण; केवल अल्प, शोधित मात्रा में प्रयोग करें। गर्भावस्था, उच्च पित्त, व्रण तथा रक्तस्राव में वर्जित। निर्देशन में ही प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

चित्रक पतली शाखाओं वाला बहुवर्षीय क्षुप है, जो भारत के मैदानों तथा निचली पहाड़ियों में मिलता है और उद्यानों में उगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चित्रक किसमें प्रयुक्त होता है?

चित्रक सर्वाधिक प्रबल शास्त्रीय पाचक उत्तेजक है, जो अत्यन्त क्षीण अग्नि, अर्श, शोथ, यकृत् एवं प्लीहा की वृद्धि तथा कृमि में प्रयुक्त होता है। यह तीक्ष्ण है और चित्रकादि वटी जैसे योगों के भीतर अल्प मात्रा में दिया जाता है।

क्या चित्रक को प्रयोग से पूर्व शोधन चाहिए?

हाँ। कच्चा मूल क्षोभक है और शास्त्रीय परम्परा आन्तरिक प्रयोग से पूर्व शोधन — परम्परागत रूप से चूने के जल में भिगोना — अपेक्षित करती है। केवल अनुज्ञप्त निर्माता का शोधित द्रव्य ही लें।

चित्रक की मात्रा क्या है?

शोधित मूल चूर्ण प्रतिदिन 500 मिग्रा – 1 ग्राम, किसी योग के भीतर। आयुर्वेदीय मानकों से यह अल्प मात्रा है और द्रव्य की तीक्ष्णता को दर्शाती है — यह स्वच्छन्द रूप से लेने का द्रव्य नहीं है।

चित्रक किसे नहीं लेना चाहिए?

गर्भावस्था में वर्जित — इसकी गर्भपातक ख्याति प्रलेखित है। अम्लपित्त, परिणामशूल, शोथयुक्त आन्त्र-रोग तथा किसी भी रक्तस्राव-अवस्था में वर्जित। बालकों हेतु अथवा स्वयं-चिकित्सा हेतु नहीं।

क्या चित्रक त्वचा पर लगाया जा सकता है?

मूल का कल्क जीर्ण त्वचा-रोग तथा श्वित्र में बाह्य रूप से प्रयुक्त होता है, किन्तु यह प्रबल प्रतिक्षोभक है जो अधिक देर रखने पर त्वचा पर फफोले ला देता है। केवल चिकित्सक के निर्देशन में प्रयोग करें और टूटी त्वचा पर कभी नहीं।

चित्रक को हिन्दी में क्या कहते हैं?

चित्रक। अंग्रेज़ी में इसे सीलोन लेडवर्ट अथवा व्हाइट लेडवर्ट कहते हैं। लाल पुष्पों वाली एक जाति, Plumbago rosea, भी प्रयुक्त होती है और उसे और भी प्रबल माना जाता है।

चित्रक इतने योगों में क्यों रहता है?

क्योंकि यह अपने साथ जो भी हो उसके पाचन एवं अवशोषण को सुधारता है। शास्त्रीय योग-रचना इसे अपने स्वयं के कर्म हेतु जितना, उतना ही अन्य द्रव्यों को कार्यकारी बनाने हेतु प्रयुक्त करती है।

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