चित्र: Jeevan Jose, Kerala, India / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
नागरमोथा मुस्ता
Cyperus rotundus · Cyperaceae
अन्य नाम: नागरमोथा, मोथा, नट ग्रास
प्रयोज्य अंग: प्रकन्द
मुस्ता (Cyperus rotundus) नागरमोथा है, एक दृढ़ सेज-वनस्पति जिसके छोटे कन्द आयुर्वेद के सर्वाधिक प्रयुक्त पाचक द्रव्यों में से एक हैं। यह तिक्त एवं शीत है, जो उसे पाचकों में असामान्य बनाता है, और यह ज्वर-युक्त अतिसार तथा पाचन-विकार सहित ज्वरों का शास्त्रोक्त चयन है।
| रस | तिक्त, कटु, कषाय |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | कटु |
| दोष-कर्म | कफ और पित्त का शमन |
| प्रभाव | दीपन, ग्राही (शोषक) |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Cyperus rotundus
- प्रयोज्य अंग: प्रकन्द
- दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; पाचक योगों का सामान्य घटक।
नागरमोथा के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
मुस्ता (Cyperus rotundus), अर्थात् नागरमोथा, एक शास्त्रीय पाचक एवं पित्तशामक द्रव्य है। इसका सुगन्धित प्रकन्द आन्त्र को शीतलता देते हुए अग्नि प्रदीप्त करता है, जिससे यह अतिसार, ज्वर तथा मन्दाग्नि का प्रमुख उपाय बनता है।
वर्गीकरण
साइपरेसी (Cyperaceae) कुल की मुस्ता दीपन तथा ग्राही द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका तिक्त-कटु-कषाय रस एवं शीत वीर्य पित्त बढ़ाए बिना अग्नि प्रदीप्त करते हैं।
उपयोग एवं लाभ
मुस्ता ज्वर सहित द्रव, शूलयुक्त कोष्ठ का शास्त्रोक्त द्रव्य है। एक साथ ग्राही एवं दीपन होने से यह अपक्व मल सहित अतिसार में, ग्रहणी में तथा मन्दाग्नि-युक्त ज्वरों में प्रयुक्त होती है। यह मृदु आर्तवजनन भी है और स्त्री-योगों में सम्मिलित रहती है।
ज्वर-युक्त अतिसार हेतु मुस्ता
इसका परिभाषक संकेत। एक साथ दीपन एवं ग्राही, तथा उष्ण नहीं अपितु शीत — जो संक्रमणजन्य अतिसार के ठीक अनुकूल बैठता है।
अजीर्ण हेतु मुस्ता
अरुचि एवं अपूर्ण पाचन हेतु प्रयुक्त तिक्त दीपन द्रव्य, वहाँ जहाँ कोई उष्ण मसाला वृद्धि कर देता।
ज्वर हेतु मुस्ता
समस्त शास्त्रीय ज्वर-योगों में नामित, विशेषतः वहाँ जहाँ पाचन विकृत हो।
आम हेतु मुस्ता
एक आमपाचन द्रव्य, जो वहाँ प्रयुक्त होता है जहाँ गौरव तथा मन्द ज्वर के मूल में अपक्व अन्न-शेष माना जाता है।
रजोविकारों हेतु मुस्ता
कष्टयुक्त एवं अनियमित रजोदर्शन में, तथा अपने कषाय कर्म के आधार पर अत्यधिक रक्तस्राव में प्रयुक्त।
स्तन्य हेतु मुस्ता
स्तन्य की मात्रा नहीं, अपितु गुणवत्ता सुधारने हेतु परम्परागत रूप से प्रयुक्त।
स्थौल्य हेतु मुस्ता
मेदोहर द्रव्यों में नामित; इसका तिक्त, रूक्ष स्वभाव ही आधार है।
दाह एवं तृष्णा हेतु मुस्ता
शीत होने से उष्णता एवं अत्यधिक तृष्णा सहित पित्त-अवस्थाओं में प्रयुक्त।
त्वचा-विकारों हेतु मुस्ता
कण्डू तथा शोथयुक्त त्वचा-विकारों में बाह्य रूप से लेप के रूप में लगाई जाती है।
मुस्तकारिष्ट एवं मुस्ता चूर्ण में मुस्ता
अतिसार तथा पाचन-विकारों हेतु शास्त्रीय कल्पों का प्रधान द्रव्य।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; पाचक योगों का सामान्य घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
नागरमोथा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में नागरमोथा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (अतिसार एवं ज्वर प्रकरण); भावप्रकाश निघण्टु (कर्पूरादि वर्ग).
चरक संहिता में नागरमोथा के विषय में क्या कहा गया है?
अतिसार एवं ज्वर हेतु उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — अतिसार एवं ज्वर प्रकरण.
भावप्रकाश निघण्टु में नागरमोथा के विषय में क्या कहा गया है?
दीपन एवं ग्राही के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग.
आयुर्वेद में नागरमोथा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
मुस्ता ज्वर सहित द्रव, शूलयुक्त कोष्ठ का शास्त्रोक्त द्रव्य है। एक साथ ग्राही एवं दीपन होने से यह अपक्व मल सहित अतिसार में, ग्रहणी में तथा मन्दाग्नि-युक्त ज्वरों में प्रयुक्त होती है। यह मृदु आर्तवजनन भी है और स्त्री-योगों में सम्मिलित रहती है।
नागरमोथा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस तिक्त, कटु, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, वीर्य शीत, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और पित्त का शमन. प्रभाव: दीपन, ग्राही (शोषक).
नागरमोथा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। नागरमोथा का वीर्य शीत है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और पित्त का शमन.
नागरमोथा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: प्रकन्द.
नागरमोथा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण 1–3 ग्राम अथवा क्वाथ; पाचक योगों का सामान्य घटक। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
नागरमोथा का प्रयोग कब वर्जित है?
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
नागरमोथा कहाँ पाया जाता है?
मुस्ता सुगन्धित कन्दों वाली सेज-वनस्पति है, जो भारत भर के आर्द्र खेतों, तटों तथा बंजर भूमि में सामान्य खरपतवार के रूप में उगती है।
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — कर्पूरादि वर्ग
दीपन एवं ग्राही के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — अतिसार एवं ज्वर प्रकरण
अतिसार एवं ज्वर हेतु उल्लिखित।
Modern research
-
Phytochemistry, data mining, pharmacology, toxicology and the analytical methods of Cyperus rotundus L. (Cyperaceae): a comprehensive review
(see source). (2023)
A comprehensive review documenting Cyperus rotundus (Musta)'s anti-inflammatory, analgesic, antidiarrhoeal and neuroprotective pharmacology.
View study doi:10.1007/s11101-023-09870-3 -
Studies on the activity of Cyperus rotundus Linn. tubers against infectious diarrhea
(see source). (2011)
A study reporting antidiarrhoeal activity of Cyperus rotundus tubers against infectious diarrhoea.
View study doi:10.4103/0253-7613.81502
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में ही प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
मुस्ता सुगन्धित कन्दों वाली सेज-वनस्पति है, जो भारत भर के आर्द्र खेतों, तटों तथा बंजर भूमि में सामान्य खरपतवार के रूप में उगती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मुस्ता किसमें प्रयुक्त होती है?
ज्वर-युक्त अतिसार उसका परिभाषक संकेत है — यह एक साथ अग्नि प्रदीप्त करती है और मल को रोकती है, तथा उष्ण नहीं अपितु शीत है। यह अजीर्ण, ज्वर, रजोविकारों तथा स्थौल्य में भी प्रयुक्त होती है।
मुस्ता की मात्रा क्या है?
कन्द चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, अथवा क्वाथ 40–80 मिली दिन में दो बार। यह प्रायः अकेले नहीं, अपितु किसी योग के भीतर दी जाती है।
कुछ पाचन-विकारों में अदरक की अपेक्षा मुस्ता क्यों वरीय है?
क्योंकि यह दीपन होते हुए भी शीत है। ज्वर-युक्त अतिसार में, अथवा पित्त-प्रकृति के अजीर्ण में, अदरक जैसा उष्ण मसाला चित्र बिगाड़ देता है — मुस्ता उष्णता जोड़े बिना पाचन सुधारती है।
मुस्ता को हिन्दी में क्या कहते हैं?
नागरमोथा अथवा मोथा। अंग्रेज़ी में नट ग्रास अथवा पर्पल नटसेज। इसे विश्व की सर्वाधिक दृढ़ कृषि-खरपतवारों में गिना जाता है, जिससे आपूर्ति प्रचुर रहती है।
क्या मुस्ता के दुष्प्रभाव हैं?
शास्त्रोक्त मात्रा में सुसह्य। तिक्त एवं रूक्ष होने से दीर्घ प्रयोग वात बढ़ा सकता है। गर्भावस्था में चिकित्सक से परामर्श लें, क्योंकि रजोचक्र पर इसका पारम्परिक प्रभाव माना जाता है।
क्या मुस्ता वज़न घटाने में सहायक है?
यह मेदोहर द्रव्यों में नामित है और शास्त्रीय वज़न-योगों में सम्मिलित रहती है, जो अपने तिक्त, रूक्ष एवं पाचक कर्म से कार्य करती है। यह अकेले प्रभावी होने के स्थान पर व्यापक दृष्टिकोण के भीतर सहायक है।
नागरमोथा का कौन-सा अंग प्रयुक्त होता है?
जड़ों पर लगे छोटे गहरे कन्द, जो सुखाकर चूर्ण किए जाते हैं। घास स्वयं औषधीय अंग नहीं है।