आयुर्वेदीय द्रव्य

बायबिडंग, वायविडंग विडङ्ग

Embelia ribes · Primulaceae

अन्य नाम: वायविडंग, बायबिडंग, विडंग, फ़ाल्स ब्लैक पेपर

प्रयोज्य अंग: फल

विडंग (Embelia ribes) फ़ाल्स ब्लैक पेपर है, आन्त्रगत कृमियों हेतु आयुर्वेद की प्रधान ओषधि। शास्त्र इसे प्रधान कृमिघ्न द्रव्य कहते हैं, और उसका सक्रिय घटक एम्बेलिन प्रलेखित कृमि-नाशक क्रिया रखता है। यह पाचन, त्वचा-रोग तथा रसायन के रूप में भी प्रयुक्त होती है।

बायबिडंग, वायविडंग — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसकटु, कषाय
गुणलघु, रूक्ष, तीक्ष्ण
वीर्यउष्ण
विपाककटु
दोष-कर्मकफ और वात का शमन
प्रभावकृमिघ्न (antiparasitic), रसायन

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Embelia ribes
  • प्रयोज्य अंग: फल
  • दोष-कर्म: कफ और वात का शमन
  • सामान्य मात्रा: चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ अथवा कृमिघ्न योगों के अंग रूप में।

बायबिडंग, वायविडंग के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीबायबिडंग, वायविडंग
अंग्रेज़ीFalse Black Pepper
संस्कृतविडङ्ग, कृमिघ्न
बंगालीবিড়ঙ্গ
गुजरातीવાવડિંગ
मराठीवावडिंग
तमिलவாய்விளங்கம்
तेलुगुవాయువిడంగాలు
कन्नड़ವಾಯುವಿಳಂಗ
मलयालमവിഴാൽ
लैटिन (वानस्पतिक)Embelia ribes

परिचय

विडंग (Embelia ribes) आयुर्वेद की प्रधान कृमिघ्न ओषधि है, जिसके छोटे फल आन्त्रगत कृमियों को निकालने तथा स्वच्छ, स्वस्थ आन्त्र को सहारा देने में प्रयुक्त होते हैं। उष्ण एवं लघु होकर यह पाचन तथा चयापचय में भी सहायक है।

वर्गीकरण

प्रिम्युलेसी (Primulaceae) कुल की विडंग कृमिघ्न द्रव्यों में प्रधान है। इसका कटु-कषाय रस, भेदक गुण तथा उष्ण वीर्य पाचन-मार्ग से परजीवी, आम एवं कफ का हरण करते हैं।

उपयोग एवं लाभ

विडंग शास्त्रीय कृमिघ्न द्रव्य है, जो आन्त्रगत कृमियों हेतु दिया जाता है और मधु अथवा तक्र के साथ लिया जाता है। यह दीपन भी है और उदर-असुख सहित मन्द पाचन में प्रयुक्त होती है, तथा आन्त्र पर अपने शोधक कर्म हेतु रसायन योगों में आती है।

आन्त्रगत कृमियों हेतु विडंग

शास्त्रों में प्रधान कृमिघ्न द्रव्य — इसका परिभाषक तथा सर्वाधिक सुस्थापित प्रयोग।

पाचन हेतु विडंग

अपने कृमि-नाशक कर्म के साथ-साथ आध्मान एवं अरुचि में प्रयुक्त एक दीपन तथा पाचन द्रव्य।

त्वचा-रोग हेतु विडंग

जीर्ण कुष्ठ में प्रयुक्त, विशेषतः वहाँ जहाँ परजीवी अथवा संक्रमण संलिप्त हों।

रसायन के रूप में विडंग

कायाकल्पकारी द्रव्यों में वर्गीकृत, जो इतने विशिष्ट प्रधान संकेत वाले द्रव्य हेतु असामान्य है।

स्थौल्य हेतु विडंग

मेदोहर द्रव्यों में नामित, जो भार-योगों के भीतर प्रयुक्त होती है।

विबन्ध हेतु विडंग

मृदु रेचक, जो परजीवियों के निष्कासन को सहारा देती है।

गर्भ-निरोधक के रूप में विडंग

शास्त्रों में अंकित तथा कुछ प्राणी-कार्य से समर्थित एक पारम्परिक प्रजनन-रोधी प्रयोग — यह विश्वसनीय गर्भ-निरोधक विधि नहीं है।

ज्वर हेतु विडंग

योगों के भीतर ज्वर में प्रयुक्त, विशेषतः पाचन-संलिप्तता सहित।

शिर हेतु विडंग

शिरःशूल तथा नासा-विकारों हेतु नस्य-कल्पों में प्रयुक्त।

विडंगादि चूर्ण तथा विडंगारिष्ट में विडंग

शास्त्रीय कृमिघ्न कल्पों की प्रधान ओषधि।

मात्रा — कितना लें

चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ अथवा कृमिघ्न योगों के अंग रूप में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

बायबिडंग, वायविडंग का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में बायबिडंग, वायविडंग के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (कृमि चिकित्सा); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).

चरक संहिता में बायबिडंग, वायविडंग के विषय में क्या कहा गया है?

आन्त्रगत परजीवियों हेतु श्रेष्ठ कहा गया। सन्दर्भ: चरक संहिता — कृमि चिकित्सा.

भावप्रकाश निघण्टु में बायबिडंग, वायविडंग के विषय में क्या कहा गया है?

प्रधान कृमिघ्न द्रव्य के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में बायबिडंग, वायविडंग किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

विडंग शास्त्रीय कृमिघ्न द्रव्य है, जो आन्त्रगत कृमियों हेतु दिया जाता है और मधु अथवा तक्र के साथ लिया जाता है। यह दीपन भी है और उदर-असुख सहित मन्द पाचन में प्रयुक्त होती है, तथा आन्त्र पर अपने शोधक कर्म हेतु रसायन योगों में आती है।

बायबिडंग, वायविडंग के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस कटु, कषाय, गुण लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, वीर्य उष्ण, विपाक कटु. दोष-कर्म: कफ और वात का शमन. प्रभाव: कृमिघ्न (antiparasitic), रसायन.

बायबिडंग, वायविडंग को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। बायबिडंग, वायविडंग का वीर्य उष्ण है और विपाक कटु — इसी से इसका कर्म बनता है: कफ और वात का शमन.

बायबिडंग, वायविडंग का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: फल.

बायबिडंग, वायविडंग की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

चूर्ण 1–3 ग्राम, प्रायः मधु के साथ अथवा कृमिघ्न योगों के अंग रूप में। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

बायबिडंग, वायविडंग का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में प्रयोग करें।

बायबिडंग, वायविडंग कहाँ पाया जाता है?

विडंग भारत भर के पहाड़ी वनों, विशेषतः पश्चिमी घाट तथा निचले हिमालय, की एक बड़ी आरोही लता है, जिसके फल औषधि हेतु संचित होते हैं।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
    प्रधान कृमिघ्न द्रव्य के रूप में वर्णित।
  • चरक संहिता — कृमि चिकित्सा
    आन्त्रगत परजीवियों हेतु श्रेष्ठ कहा गया।

Modern research

  1. Reviewing the Traditional/Modern Uses, Phytochemistry, Essential Oils/Extracts and Pharmacology of Embelia ribes (see source). Antioxidants (2022)

    A comprehensive review of Embelia ribes (Vidanga) covering its anthelmintic, antioxidant, antidiabetic and anti-inflammatory pharmacology.

    View study doi:10.3390/antiox11071359
  2. Further Studies on Antioxidant Potential and Protection of Pancreatic β-Cells by Embelia ribes in Experimental Diabetes (see source). (2007)

    An experimental diabetes study reporting Embelia ribes reduced blood glucose and protected pancreatic β-cells through antioxidant effects.

    View study doi:10.1155/2007/15803

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; गर्भावस्था में निर्देशन में प्रयोग करें।

प्राप्ति स्थान

विडंग भारत भर के पहाड़ी वनों, विशेषतः पश्चिमी घाट तथा निचले हिमालय, की एक बड़ी आरोही लता है, जिसके फल औषधि हेतु संचित होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विडंग किसमें प्रयुक्त होती है?

सर्वोपरि आन्त्रगत कृमियों में — शास्त्र इसे प्रधान कृमिघ्न द्रव्य कहते हैं। यह आध्मान एवं अरुचि, जीर्ण त्वचा-रोग, स्थौल्य, तथा रसायन के रूप में भी प्रयुक्त होती है।

क्या विडंग वस्तुतः कृमियों का नाश करती है?

इसका सक्रिय घटक एम्बेलिन प्रलेखित कृमि-नाशक क्रिया रखता है, और शास्त्रीय प्रयोग सुसंगत एवं दीर्घकालिक है। पुष्ट परजीवी संक्रमण हेतु प्रचलित चिकित्सा शीघ्रतर एवं अधिक विश्वसनीय है — निदान कराएँ और उचित उपचार लें।

विडंग की मात्रा क्या है?

फल-चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, पारम्परिक रूप से रिक्त उदर पर मधु अथवा तक्र के साथ, तत्पश्चात् परजीवियों को निकालने हेतु मृदु विरेचक। एक क्रम प्रायः तीन से सात दिन चलता है।

विडंग किसे नहीं लेनी चाहिए?

गर्भावस्था में तथा गर्भधारण का प्रयास करते समय वर्जित — शास्त्रीय विवरणों एवं प्राणी-अध्ययनों दोनों में इसका प्रलेखित प्रजनन-रोधी प्रभाव है। स्तनपान कराती हों तो परामर्श लें, और छोटे बालकों में बिना निर्देश वर्जित।

क्या विडंग गर्भ-निरोधक है?

इसका पारम्परिक प्रजनन-रोधी प्रयोग है जिसे कुछ प्राणी-कार्य का समर्थन प्राप्त है, किन्तु यह विश्वसनीय गर्भ-निरोधक नहीं है और उस रूप में प्रयुक्त नहीं होनी चाहिए। व्यावहारिक निहितार्थ विपरीत है — गर्भधारण का प्रयास कर रहे हों तो इससे बचें।

विडंग को हिन्दी में क्या कहते हैं?

बायबिडंग अथवा वायविडंग। अंग्रेज़ी में फ़ाल्स ब्लैक पेपर अथवा विडंग। फल काली मिर्च जैसा दिखता है, जहाँ से अंग्रेज़ी नाम आया है, किन्तु ये असम्बद्ध वनस्पतियाँ हैं।

क्या Embelia ribes संकटग्रस्त है?

भारत में यह पर्याप्त संग्रह-दबाव में है और अपने विस्तार के कुछ भागों में संकटग्रस्त सूचीबद्ध है। मिलावट एवं प्रतिस्थापन सामान्य हैं। देखें कि वानस्पतिक नाम तथा कृषित अथवा प्रमाणित स्रोत अंकित हो।

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