असगंध / अश्वगंधा (Withania somnifera) — root
असगंध / अश्वगंधा — Withania somnifera. प्रयोज्य अंग: मूल.
चित्र: Piyush Kothari / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आयुर्वेदीय द्रव्य

असगंध / अश्वगंधा

Withania somnifera

अन्य नाम: असगंध

प्रयोज्य अंग: मूल

अश्वगंधा (Withania somnifera) एक भारतीय क्षुप है जिसका मूल आयुर्वेद का सर्वाधिक प्रसिद्ध अनुकूलक (एडाप्टोजन) है। रसायन तथा बल्य द्रव्य के रूप में वर्गीकृत यह तनाव, चिन्ता, अनिद्रा, दुर्बलता और मांसपेशियों की क्षीणता में प्रयुक्त होता है। इसका नाम "अश्व की गन्ध" का द्योतक है — मूल की गन्ध तथा उससे प्राप्त होने वाले बल, दोनों के कारण।

असगंध / अश्वगंधा — आयुर्वेदीय गुण-कर्म
रसतिक्त, कषाय, मधुर
गुणलघु, स्निग्ध
वीर्यउष्ण
विपाकमधुर
दोष-कर्मवात और कफ का शमन
प्रभावबल्य, रसायन, मेध्य

सार-संक्षेप

  • वानस्पतिक नाम: Withania somnifera
  • प्रयोज्य अंग: मूल
  • दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
  • सामान्य मात्रा: मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः गर्म दूध, घृत या मधु के साथ, दिन में एक या दो बार।

असगंध / अश्वगंधा के अन्य भाषाओं में नाम

हिन्दीअसगंध / अश्वगंधा
अंग्रेज़ीWinter Cherry, Indian Ginseng
संस्कृतअश्वगन्धा, वाराहकर्णी
बंगालीঅশ্বগন্ধা
गुजरातीઆસંધ
मराठीआस्कंध, टिळगणी
तमिलஅமுக்கிரா
तेलुगुపెన్నేరు గడ్డ
कन्नड़ಅಶ್ವಗಂಧ, ಹಿರೇಮದ್ದಿನಗಿಡ
मलयालमഅമുക്കുരം
पंजाबीਅਸਗੰਧ
उर्दूاسگندھ
लैटिन (वानस्पतिक)Withania somnifera
अरबी카카نج (Kaknaj Hindi)

परिचय

अश्वगंधा (Withania somnifera) आयुर्वेद के सर्वाधिक पूजनीय रसायन द्रव्यों में से एक है, जिसे बल्य (बलवर्धक) तथा रसायन (कायाकल्पकारी) द्रव्य के अन्तर्गत गिना जाता है। इसके संस्कृत नाम का अर्थ है "अश्व की गन्ध" — यह संकेत ताज़े मूल की गन्ध और उससे प्राप्त होने वाले बल एवं ओज, दोनों की ओर है। मुख्य प्रयोज्य अंग मूल है।

वर्गीकरण

वानस्पतिक दृष्टि से अश्वगंधा सोलेनेसी (Solanaceae) कुल का द्रव्य है। आयुर्वेदीय द्रव्यगुण में इसे बल्य तथा रसायन द्रव्यों में गिना जाता है और यह भावप्रकाश निघण्टु के गुडूच्यादि वर्ग में वर्णित है। इसका उष्ण वीर्य तथा मधुर विपाक इसे पोषक बनाते हुए भी वात एवं कफ का शमन करने वाला बनाता है।

उपयोग एवं लाभ

परम्परागत रूप से अश्वगंधा शारीरिक बल एवं सहनशक्ति बढ़ाने, मन को शान्त करने, तनाव और चिन्ता दूर करने, गहरी निद्रा लाने तथा स्वस्थ मांस एवं शुक्र धातु के पोषण हेतु प्रयुक्त होता है। मेध्य रसायन के रूप में यह रोगमुक्ति के बाद की दुर्बलता, अति-परिश्रम तथा वार्धक्यजन्य क्षीणता में विशेष उपयोगी माना गया है। आधुनिक अनुसन्धान का केन्द्र तनाव एवं कॉर्टिसोल सन्तुलन में इसकी अनुकूलक भूमिका है।

तनाव एवं चिन्ता में अश्वगंधा

यह इसका सर्वाधिक शोधित प्रयोग है। अनुकूलक (एडाप्टोजन) होने के कारण यह शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया को सन्तुलित करता है, निद्राजनक की भाँति सुलाता नहीं — इसीलिए यह दिन में भी लिया जा सकता है, जहाँ कोई निद्राजनक औषधि उपयुक्त न होगी।

निद्रा हेतु अश्वगंधा

इसकी जाति का नाम somnifera का अर्थ ही है 'निद्रा लाने वाला'। अशान्त मन के कारण नींद न आने की स्थिति में यह प्रयुक्त होता है, प्रायः रात्रि में गर्म दूध के साथ।

बल एवं सहनशक्ति हेतु अश्वगंधा

यह बल्य द्रव्य है — बलवर्धक। रोगमुक्ति के पश्चात्, कृशता तथा शारीरिक क्षय में प्रयुक्त होता है, और धातु-पोषण हेतु परम्परागत रूप से दूध एवं घृत के साथ दिया जाता है।

मांसपेशी एवं सन्धि-शूल में अश्वगंधा

उन समस्त वात-व्याधियों में प्रयुक्त जहाँ शूल के साथ जकड़न और दुर्बलता भी हो। यह अश्वगन्धारिष्ट तथा महानारायण तैल का घटक द्रव्य है।

थायरॉइड सहायता हेतु अश्वगंधा

थकान एवं शीत-असहिष्णुता के साथ थायरॉइड की न्यून अवस्था में परम्परागत रूप से प्रयुक्त। थायरॉइड की औषधि लेने वाले व्यक्ति को अपने चिकित्सक को अवश्य सूचित करना चाहिए, क्योंकि प्रभाव संचित हो सकते हैं।

वाजीकरण द्रव्य के रूप में अश्वगंधा

शास्त्रों में इसे वृष्य द्रव्यों में गिना गया है, जो पुरुष-प्रजनन शक्ति एवं क्षीण कामेच्छा में प्रयुक्त होते हैं — यह एक सुप्रमाणित पारम्परिक संकेत है।

रोग-प्रतिरोधक क्षमता हेतु अश्वगंधा

रसायन वर्गीकरण में सामान्य रोग-प्रतिरोध भी सम्मिलित है। इसे रोग के प्रथम लक्षण पर नहीं, अपितु कई सप्ताह तक निरन्तर लिया जाता है।

स्मृति एवं एकाग्रता हेतु अश्वगंधा

मेध्य द्रव्य के रूप में वहाँ प्रयुक्त जहाँ थकान या तनाव के पश्चात् एकाग्रता क्षीण हो जाती है — उत्तेजक (स्टिमुलेंट) के रूप में नहीं।

रोग के पश्चात् पुनर्लाभ में अश्वगंधा

यह शास्त्रोक्त संकेतों में सर्वाधिक स्पष्ट है: दीर्घ रोग के बाद कृश, क्षीण एवं निद्राहीन रोगी का पुनर्निर्माण।

शास्त्रीय योगों में अश्वगंधा

यह अश्वगन्धारिष्ट तथा अश्वगन्धादि चूर्ण का प्रधान द्रव्य है, और अधिकांश बल्य एवं वातहर योगों में सम्मिलित रहता है।

मात्रा — कितना लें

मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः गर्म दूध, घृत या मधु के साथ, दिन में एक या दो बार। मानकीकृत सत्त्व (एक्सट्रैक्ट) की मात्रा इससे बहुत कम होती है। निद्रा हेतु रात्रि में तथा बल हेतु भोजनोपरान्त लेना श्रेष्ठ है। सदैव अपने वैद्य द्वारा बताई गई मात्रा का ही पालन करें।

मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।

पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर

उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।

असगंध / अश्वगंधा का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?

इस संग्रह में असगंध / अश्वगंधा के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (बल्य एवं रसायन द्रव्य); भावप्रकाश निघण्टु (गुडूच्यादि वर्ग).

चरक संहिता में असगंध / अश्वगंधा के विषय में क्या कहा गया है?

बलवर्धक एवं रसायन द्रव्यों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — बल्य एवं रसायन द्रव्य.

भावप्रकाश निघण्टु में असगंध / अश्वगंधा के विषय में क्या कहा गया है?

बल्य तथा रसायन गुणों सहित वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग.

आयुर्वेद में असगंध / अश्वगंधा किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?

परम्परागत रूप से अश्वगंधा शारीरिक बल एवं सहनशक्ति बढ़ाने, मन को शान्त करने, तनाव और चिन्ता दूर करने, गहरी निद्रा लाने तथा स्वस्थ मांस एवं शुक्र धातु के पोषण हेतु प्रयुक्त होता है। मेध्य रसायन के रूप में यह रोगमुक्ति के बाद की दुर्बलता, अति-परिश्रम तथा वार्धक्यजन्य क्षीणता में विशेष उपयोगी माना गया है। आधुनिक अनुसन्धान का केन्द्र तनाव एवं कॉर्टिसोल सन्तुलन में इसकी अनुकूलक भूमिका है।

असगंध / अश्वगंधा के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?

रस तिक्त, कषाय, मधुर, गुण लघु, स्निग्ध, वीर्य उष्ण, विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: बल्य, रसायन, मेध्य.

असगंध / अश्वगंधा को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?

द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। असगंध / अश्वगंधा का वीर्य उष्ण है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.

असगंध / अश्वगंधा का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?

प्रयोज्य अंग: मूल.

असगंध / अश्वगंधा की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?

मूल चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः गर्म दूध, घृत या मधु के साथ, दिन में एक या दो बार। मानकीकृत सत्त्व (एक्सट्रैक्ट) की मात्रा इससे बहुत कम होती है। निद्रा हेतु रात्रि में तथा बल हेतु भोजनोपरान्त लेना श्रेष्ठ है। सदैव अपने वैद्य द्वारा बताई गई मात्रा का ही पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।

असगंध / अश्वगंधा का प्रयोग कब वर्जित है?

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुसह्य है। उग्र पित्त-वृद्धि अथवा ज्वर की तीव्र अवस्था में बिना परामर्श प्रयोग न करें, तथा गर्भावस्था में सावधानी बरतें। प्रयोग से पूर्व योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें, विशेषतः निद्राजनक अथवा थायरॉइड की औषधि के साथ।

असगंध / अश्वगंधा कहाँ पाया जाता है?

अश्वगंधा एक छोटा काष्ठीय क्षुप है जो भारत, मध्य-पूर्व तथा उत्तरी अफ़्रीका के शुष्क प्रदेशों का मूल निवासी है। भारत में इसकी खेती मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में व्यापक रूप से होती है; यह उष्ण जलवायु में शुष्क, बलुई तथा जल-निकास वाली भूमि में भली-भाँति पनपता है।

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • चरक संहिता — बल्य एवं रसायन द्रव्य
    बलवर्धक एवं रसायन द्रव्यों में उल्लिखित।
  • भावप्रकाश निघण्टु — गुडूच्यादि वर्ग
    बल्य तथा रसायन गुणों सहित वर्णित।

Modern research

  1. Effects of Ashwagandha (Withania somnifera) on stress and anxiety: A systematic review and meta-analysis Systematic review authors (see source). (systematic review / meta-analysis) (2024)

    A systematic review and meta-analysis of randomized controlled trials reporting a significant effect of ashwagandha supplementation on perceived-stress measures in adults.

    View study doi:10.1016/j.explore.2024.103062
  2. Adaptogenic and Anxiolytic Effects of Ashwagandha Root Extract in Healthy Adults: A Double-blind, Randomized, Placebo-controlled Clinical Study Salve J, Pate S, Debnath K, Langade D. Cureus (2019)

    A 60-day RCT in 60 stressed adults reported that 240 mg/day standardized ashwagandha extract was associated with greater reductions in morning cortisol and anxiety scores than placebo.

    View study doi:10.7759/cureus.6466
  3. A prospective, randomized double-blind, placebo-controlled study of safety and efficacy of a high-concentration full-spectrum extract of ashwagandha root in reducing stress and anxiety in adults Chandrasekhar K, Kapoor J, Anishetty S. Indian Journal of Psychological Medicine (2012)

    A 60-day RCT (n=64) found high-concentration ashwagandha root extract significantly reduced stress-scale scores and serum cortisol versus placebo, with a good safety profile.

    View study doi:10.4103/0253-7176.106022

सुरक्षा एवं सावधानियाँ

शास्त्रोक्त मात्रा में सामान्यतः सुसह्य है। उग्र पित्त-वृद्धि अथवा ज्वर की तीव्र अवस्था में बिना परामर्श प्रयोग न करें, तथा गर्भावस्था में सावधानी बरतें। प्रयोग से पूर्व योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें, विशेषतः निद्राजनक अथवा थायरॉइड की औषधि के साथ।

प्राप्ति स्थान

अश्वगंधा एक छोटा काष्ठीय क्षुप है जो भारत, मध्य-पूर्व तथा उत्तरी अफ़्रीका के शुष्क प्रदेशों का मूल निवासी है। भारत में इसकी खेती मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में व्यापक रूप से होती है; यह उष्ण जलवायु में शुष्क, बलुई तथा जल-निकास वाली भूमि में भली-भाँति पनपता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अश्वगंधा क्या करता है?

अश्वगंधा एक अनुकूलक (एडाप्टोजन) है: यह शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया को सन्तुलित करता है। आयुर्वेद में यह चिन्ता, अनिद्रा, क्षीण सहनशक्ति, मांस-दौर्बल्य तथा रोग के पश्चात् पुनर्लाभ में प्रयुक्त होता है, और इसे रसायन (कायाकल्पकारी) एवं बल्य (बलवर्धक), दोनों वर्गों में गिना गया है।

अश्वगंधा प्रतिदिन कितनी मात्रा में लेना चाहिए?

मूल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः गर्म दूध के साथ। इसे थोड़े समय के लिए नहीं, अपितु छह से बारह सप्ताह तक लिया जाता है, क्योंकि अनुकूलक प्रभाव क्रमशः बनता है। मानकीकृत सत्त्व की मात्रा इससे कहीं कम होती है — उसके लिए चूर्ण का आँकड़ा नहीं, उत्पाद के लेबल का पालन करें।

अश्वगंधा लेने का सर्वोत्तम समय कौन-सा है?

यदि निद्रा अथवा पुनर्लाभ हेतु ले रहे हैं तो रात्रि में गर्म दूध के साथ — यही शास्त्रोक्त काल है। यदि दिन के तनाव एवं सहनशक्ति हेतु ले रहे हैं तो प्रातःकाल। समय से अधिक महत्त्वपूर्ण है नियमितता।

अश्वगंधा किसे नहीं लेना चाहिए?

गर्भावस्था में वर्जित। अतिसक्रिय थायरॉइड, स्वप्रतिरक्षा (ऑटोइम्यून) रोग, अथवा थायरॉइड, निद्राजनक या प्रतिरक्षा-दमनकारी औषधि लेने की स्थिति में पहले चिकित्सकीय परामर्श लें। यह सोलेनेसी कुल का द्रव्य है, अतः इस कुल के प्रति संवेदनशील व्यक्ति सावधानी बरतें।

क्या अश्वगंधा से वज़न बढ़ता है?

यह परम्परागत रूप से कृश व्यक्तियों में धातु-पोषण हेतु प्रयुक्त होता है, अतः वज़न बढ़ना दूध-घृत सहित शास्त्रोक्त सेवन-विधि का ज्ञात प्रभाव है, केवल द्रव्य का नहीं। सादे चूर्ण या सत्त्व के रूप में लेने पर सामान्यतः वज़न वृद्धि नहीं होती।

अश्वगंधा का प्रभाव दिखने में कितना समय लगता है?

निद्रा एवं तनाव में दो से चार सप्ताह, बल एवं सहनशक्ति में इससे अधिक। यह तत्काल प्रभाव देने वाली औषधि नहीं है — एक मात्रा से कोई अन्तर अनुभव न होना स्वाभाविक है।

क्या अश्वगंधा दीर्घकाल तक सुरक्षित है?

रसायन के रूप में इसके दीर्घकालीन प्रयोग की सुदीर्घ परम्परा है। फिर भी इसे अनिश्चित काल तक लेने के स्थान पर बीच-बीच में विराम लें, और पाचन-विकार अथवा असामान्य तन्द्रा अनुभव होने पर सेवन रोककर परामर्श लें। यकृत्-क्षति की विरल घटनाएँ प्रलेखित हैं, प्रायः सान्द्र सत्त्वों के साथ।

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