चित्र: Nive Selvaraju / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0
आँवला आमलकी
Phyllanthus emblica · Phyllanthaceae
अन्य नाम: आँवला, इण्डियन गूज़बेरी, शुद्ध शुष्क फल चूर्ण, आँवला सत्त्व
प्रयोज्य अंग: फल
आमलकी (Phyllanthus emblica), अर्थात् आँवला, त्रिफला के तीन फलों में से एक है और विटामिन सी के सर्वाधिक समृद्ध प्राकृतिक स्रोतों में गिना जाता है। आयुर्वेद इसे रसायन के रूप में — पाचन, रोग-प्रतिरोध, केश एवं त्वचा हेतु — प्रयुक्त करता है, और यह एकमात्र अम्ल फल है जो उष्ण नहीं, अपितु शीत है।
| रस | अम्ल (प्रधान), लवण को छोड़कर पाँचों रस |
|---|---|
| गुण | लघु, रूक्ष, शीत |
| वीर्य | शीत |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक |
| प्रभाव | रसायन, वयःस्थापन |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Phyllanthus emblica
- प्रयोज्य अंग: फल
- दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक
- सामान्य मात्रा: चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः मधु अथवा जल के साथ; ताज़ा स्वरस तथा आँवले का मुरब्बा भी प्रयुक्त होते हैं।
आँवला के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
आमलकी (Phyllanthus emblica), अर्थात् आँवला, आयुर्वेद का सर्वश्रेष्ठ रसायन है और विटामिन सी के सर्वाधिक समृद्ध प्राकृतिक स्रोतों में से एक। शीत एवं कायाकल्पकारी यह फल त्रिफला का तीसरा घटक है तथा दीर्घायु, रोग-प्रतिरोध एवं स्वस्थ त्वचा, केश और नेत्रों हेतु प्रसिद्ध है।
वर्गीकरण
फाइलैन्थेसी (Phyllanthaceae) कुल का यह द्रव्य भावप्रकाश निघण्टु में आम्रादि फलवर्ग के अन्तर्गत वर्णित है। इसकी विशेषता यह है कि शीत वीर्य होते हुए भी इसमें अम्ल रस प्रधान रहता है; इसका वयःस्थापन कर्म इसे प्रमुख वार्धक्य-निरोधक रसायन बनाता है।
उपयोग एवं लाभ
परम्परागत रूप से पित्त के शमन एवं सन्तुलन, रोग-प्रतिरोध की वृद्धि, स्वस्थ पाचन तथा केश, त्वचा, नेत्र और रक्त के पोषण हेतु प्रयुक्त। दैनिक रसायन के रूप में यह दीर्घायु एवं ओज हेतु मान्य है, और च्यवनप्राश का प्रधान द्रव्य है।
रोग-प्रतिरोध हेतु आमलकी
इसमें उपस्थित टैनिन के कारण इसका विटामिन सी अधिकांश फलों की अपेक्षा शुष्कन में कहीं अधिक सुरक्षित रहता है। शास्त्र इसे प्रमुखतम रसायन मानते हैं, जिसे शीतकाल भर लेने से साधारण कास-प्रतिश्याय की आवृत्ति घटती है।
अम्लपित्त एवं दाह में आमलकी
रस में अम्ल किन्तु कर्म में शीत — अम्ल फलों में यही एकमात्र अपवाद है। यही संयोग इसे अम्लपित्त तथा उदर-दाह में शास्त्रोक्त चयन बनाता है, जहाँ अन्य अम्ल पदार्थ स्थिति बिगाड़ते हैं।
केश-पात एवं पलितता में आमलकी
आन्तरिक सेवन तथा तैल-रूप में लगाने पर यह असमय श्वेत होते एवं विरल होते केशों की पारम्परिक औषधि है। यह अधिकांश शास्त्रीय केश-तैलों का आधार है, प्रायः भृंगराज के साथ।
यकृत् हेतु आमलकी
कामला तथा मन्द यकृत्-क्रिया में प्रयुक्त। इसका तिक्त-कषाय स्वभाव पित्त-प्रवाह को सहारा देता है, इसीलिए यह अधिकांश शास्त्रीय यकृत्-योगों में सम्मिलित है।
त्रिफला में आमलकी
तीन फलों में से एक, जो शीत एवं पित्तशामक तत्त्व का योगदान करता है। आमलकी के बिना त्रिफला रूक्ष एवं उष्ण हो जाता — यही उसका सन्तुलनकारी घटक है।
रक्त-शर्करा में आमलकी
शास्त्रों में इसे प्रमेहहर द्रव्यों में गिना गया है, जो चयापचय एवं मूत्र-विकारों में प्रयुक्त होते हैं। यह सहायक है, निर्धारित मधुमेह-चिकित्सा का विकल्प नहीं।
नेत्रों हेतु आमलकी
एक सुदीर्घ परम्परा वाला चाक्षुष्य द्रव्य, जो थके नेत्रों तथा आयु के साथ दृष्टि को सहारा देने हेतु मधु या घृत के साथ लिया जाता है।
विबन्ध में आमलकी
स्वयं मृदु विरेचक और त्रिफला के भीतर और अधिक। तीव्र विरेचकों के विपरीत यह नियमित प्रयोग हेतु पर्याप्त मृदु है, क्योंकि यह कोष्ठ को क्षुब्ध नहीं करता, अपितु उसका बल बढ़ाता है।
त्वचा हेतु आमलकी
रक्तपित्त तथा उष्ण, क्षुब्ध त्वचा-विकारों में प्रयुक्त। इसका शीत, रक्त-प्रसादक कर्म ही कारण है कि यह युवान-पिटिका एवं शोथयुक्त चर्म-विकारों के योगों में सम्मिलित रहता है।
दैनिक रसायन के रूप में आमलकी
चरक ने रसायन अध्याय में इसे दीर्घायु एवं धातु-गुणवत्ता का द्रव्य कहा है। व्यवहार में इसका अर्थ है — मासों तक अल्प दैनिक मात्रा, न कि थोड़े समय के लिए बड़ी मात्रा।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः मधु अथवा जल के साथ; ताज़ा स्वरस तथा आँवले का मुरब्बा भी प्रयुक्त होते हैं। रसायन के रूप में दीर्घकालीन दैनिक सेवन सुरक्षित है। चिकित्सीय मात्रा हेतु अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
आँवला का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में आँवला के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (रसायन पाद); भावप्रकाश निघण्टु (आम्रादि फलवर्ग).
चरक संहिता में आँवला के विषय में क्या कहा गया है?
प्रमुखतम रसायनों में उल्लिखित। सन्दर्भ: चरक संहिता — रसायन पाद.
भावप्रकाश निघण्टु में आँवला के विषय में क्या कहा गया है?
वयःस्थापन रसायन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — आम्रादि फलवर्ग.
आयुर्वेद में आँवला किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
परम्परागत रूप से पित्त के शमन एवं सन्तुलन, रोग-प्रतिरोध की वृद्धि, स्वस्थ पाचन तथा केश, त्वचा, नेत्र और रक्त के पोषण हेतु प्रयुक्त। दैनिक रसायन के रूप में यह दीर्घायु एवं ओज हेतु मान्य है, और च्यवनप्राश का प्रधान द्रव्य है।
आँवला के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस अम्ल (प्रधान), लवण को छोड़कर पाँचों रस, गुण लघु, रूक्ष, शीत, वीर्य शीत, विपाक मधुर. दोष-कर्म: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक. प्रभाव: रसायन, वयःस्थापन.
आँवला को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। आँवला का वीर्य शीत है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: त्रिदोषहर — तीनों दोषों का शमन, विशेषतः पित्त शामक.
आँवला का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: फल.
आँवला की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण: प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः मधु अथवा जल के साथ; ताज़ा स्वरस तथा आँवले का मुरब्बा भी प्रयुक्त होते हैं। रसायन के रूप में दीर्घकालीन दैनिक सेवन सुरक्षित है। चिकित्सीय मात्रा हेतु अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
आँवला का प्रयोग कब वर्जित है?
अत्यन्त सुसह्य तथा दीर्घ प्रयोग हेतु सुरक्षित। इसका शीत एवं अम्ल स्वभाव उन व्यक्तियों में सीमित रखना चाहिए जिनमें स्पष्ट शीत अथवा कफज मन्दाग्नि हो। चिकित्सीय मात्रा हेतु चिकित्सक से परामर्श लें।
आँवला कहाँ पाया जाता है?
आमलकी भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के मूल निवासी एक छोटे से मध्यम आकार के पर्णपाती वृक्ष का फल है, जो भारतीय मैदानों तथा मिश्रित पर्णपाती वनों में कृषित एवं वन्य, दोनों रूपों में मिलता है।
आँवला किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?
Triphala.
शास्त्रीय सन्दर्भ
- भावप्रकाश निघण्टु — आम्रादि फलवर्ग
वयःस्थापन रसायन के रूप में वर्णित। - चरक संहिता — रसायन पाद
प्रमुखतम रसायनों में उल्लिखित।
Modern research
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The impact of Emblica officinalis (Amla) on lipid profile, glucose, and C-reactive protein: A systematic review and meta-analysis of randomized controlled trials
(see source). Complementary Therapies in Medicine (2023)
A systematic review and meta-analysis of RCTs finding Amla supplementation favourably affected lipid profile, glucose and C-reactive protein in adults.
View study doi:10.1016/j.dsx.2023.102729 -
A randomized, double-blind, placebo-controlled, multicentre clinical trial to assess the efficacy and safety of Emblica officinalis extract in patients with dyslipidemia
(see source). BMC Complementary and Alternative Medicine (2019)
A 12-week multicentre RCT in dyslipidemic patients reporting significant reductions in total cholesterol, triglycerides and LDL-C with Emblica officinalis extract versus placebo.
View study doi:10.1186/s12906-019-2430-y
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
अत्यन्त सुसह्य तथा दीर्घ प्रयोग हेतु सुरक्षित। इसका शीत एवं अम्ल स्वभाव उन व्यक्तियों में सीमित रखना चाहिए जिनमें स्पष्ट शीत अथवा कफज मन्दाग्नि हो। चिकित्सीय मात्रा हेतु चिकित्सक से परामर्श लें।
प्राप्ति स्थान
आमलकी भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के मूल निवासी एक छोटे से मध्यम आकार के पर्णपाती वृक्ष का फल है, जो भारतीय मैदानों तथा मिश्रित पर्णपाती वनों में कृषित एवं वन्य, दोनों रूपों में मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आमलकी के क्या लाभ हैं?
आमलकी रोग-प्रतिरोध, अम्लपित्त, केश-पात, यकृत्-क्रिया, नेत्र-स्वास्थ्य तथा विबन्ध में प्रयुक्त होती है। यह आयुर्वेद के तीन प्रमुख रसायन द्रव्यों में से एक है, अर्थात् इसे किसी एक तीव्र व्याधि की चिकित्सा हेतु नहीं, अपितु धातु-गुणवत्ता सुधारने हेतु दीर्घकाल तक लिया जाता है।
प्रतिदिन कितनी आमलकी लेनी चाहिए?
फल चूर्ण प्रतिदिन 3–6 ग्राम, प्रायः मधु, उष्ण जल अथवा घृत के साथ। ताज़ा स्वरस 10–20 मिली। इसे सप्ताहों या मासों तक नियमित लेना श्रेष्ठ है — रसायन प्रभाव संचयी होता है, तत्काल नहीं।
क्या आमलकी खाली पेट ली जा सकती है?
हाँ, और रसायन प्रभाव हेतु यही पारम्परिक काल है। यदि प्रातः यह अत्यधिक अम्ल लगे तो मधु के साथ अथवा भोजनोपरान्त लें। सक्रिय परिणामशूल वाले व्यक्ति पहले चिकित्सक से पूछें।
क्या आमलकी से अम्लपित्त होता है?
नहीं — इसके विपरीत। रस में अम्ल होते हुए भी आमलकी अपने कर्म में शीत (शीत वीर्य) है, इसीलिए शास्त्र इसे विशेष रूप से अम्लपित्त एवं दाह में निर्दिष्ट करते हैं, जहाँ अन्य अम्ल पदार्थ हानि करते हैं।
क्या आमलकी और आँवला एक ही हैं?
हाँ। आमलकी संस्कृत नाम है और आँवला प्रचलित हिन्दी नाम — दोनों Phyllanthus emblica के लिए। इसे इण्डियन गूज़बेरी अथवा Emblica officinalis (पुराना वानस्पतिक नाम) भी कहा जाता है।
क्या आमलकी के कोई दुष्प्रभाव हैं?
यह अत्यन्त सुसह्य है। शीत एवं मृदु विरेचक होने से अधिक मात्रा मल को ढीला कर सकती है अथवा शीत, अवरुद्ध अवस्था को बढ़ा सकती है। रक्त-शर्करा पर प्रभाव के कारण औषधि लेने वाले मधुमेह-रोगी स्तर की निगरानी रखें और अपने चिकित्सक को सूचित करें।
क्या मैं अपनी औषधि के साथ आमलकी ले सकता हूँ?
यदि आप मधुमेह अथवा रक्त पतला करने की औषधि लेते हैं तो चिकित्सक को अवश्य बताएँ, क्योंकि आमलकी उनके प्रभाव को बढ़ा सकती है। अन्यथा यह सामान्यतः प्रचलित चिकित्सा के साथ सुरक्षित है, किन्तु किसी औषधि के स्थान पर जड़ी-बूटी लेने हेतु निर्धारित औषधि कभी न रोकें।
इनका घटक: Triphala