चित्र: Wiethase, Hendrik / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0
पिप्पली, पीपल पिप्पली
Piper longum · Piperaceae
अन्य नाम: पिप्पली, पीपल, पिपला मूल, पिप्पलीमूल
प्रयोज्य अंग: फल
पिप्पली (Piper longum) त्रिकटु के तीन द्रव्यों में से एक तथा आयुर्वेद का प्रधान श्वसन-द्रव्य है। यह असामान्य है कि उष्ण होते हुए भी, अधिकांश कटु द्रव्यों के विपरीत, यह रसायन भी है। यह कास, श्वास, जीर्ण श्वसन-रोग तथा अन्य द्रव्यों की शक्ति बढ़ाने हेतु प्रयुक्त होती है।
| रस | कटु |
|---|---|
| गुण | लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण |
| वीर्य | अनुष्ण (मृदु उष्ण) |
| विपाक | मधुर |
| दोष-कर्म | वात और कफ का शमन |
| प्रभाव | रसायन, वर्धमान, bioavailability enhancer |
सार-संक्षेप
- वानस्पतिक नाम: Piper longum
- प्रयोज्य अंग: फल
- दोष-कर्म: वात और कफ का शमन
- सामान्य मात्रा: चूर्ण 0.5–1 ग्राम मधु अथवा उष्ण दूध के साथ; शास्त्रीय रसायन-चिकित्सा में निगरानी के अन्तर्गत क्रमिक मात्राओं में प्रयुक्त।
पिप्पली, पीपल के अन्य भाषाओं में नाम
परिचय
पिप्पली (Piper longum) एक उष्ण पाचक एवं श्वसन द्रव्य है, तथा त्रिकटु का तीसरा कटु। विशेष रूप से यह ऐसा रसायन है जो अन्य द्रव्यों की शक्ति एवं अवशोषण भी बढ़ाता है, जिससे शास्त्रीय योगों में उसका विशिष्ट स्थान है।
वर्गीकरण
पाइपरेसी (Piperaceae) कुल की पिप्पली दीपन, कासहर तथा रसायन द्रव्यों में वर्गीकृत है। इसका कटु रस एवं भेदक गुण कफ का हरण करते हैं और अग्नि प्रदीप्त करते हैं; प्रसिद्ध रूप से यह वर्धमान (क्रमिक-मात्रा) रसायन-चिकित्सा में प्रयुक्त होती है।
उपयोग एवं लाभ
पिप्पली एक श्वसन एवं पाचक द्रव्य है जो कास, श्वास तथा शीतजन्य अवरोध में, और लिप्त जिह्वा सहित अरुचि में प्रयुक्त होती है। यह शास्त्रोक्त योगवाही भी है — अन्य द्रव्यों को गहराई तक ले जाती है — इसीलिए उन योगों में मिलाई जाती है जिनके कर्म को बढ़ाना हो। रसायन के रूप में यह क्रमिक वर्धमान क्रम में दी जाती है।
कास एवं श्वास हेतु पिप्पली
कटु वर्ग का प्रधान श्वसन-द्रव्य, जो जीर्ण कास, श्वास तथा श्वसनिका-शोथ में प्रयुक्त होता है।
रसायन के रूप में पिप्पली
कटु द्रव्यों में असामान्य — शास्त्र इसे केवल उत्तेजक नहीं, अपितु कायाकल्पकारी कहते हैं, विशेषतः फुफ्फुस हेतु।
पाचन हेतु पिप्पली
अरुचि तथा अपूर्ण पाचन में प्रयुक्त दीपन एवं पाचन द्रव्य।
त्रिकटु में पिप्पली
शुण्ठी एवं मरिच के साथ तीन कटु द्रव्यों में से एक, और उनमें श्वसन-सम्बन्धी बल सर्वाधिक इसी का है।
वर्धमान पिप्पली के रूप में
एक शास्त्रीय क्रमिक विधि जिसमें मात्रा प्रतिदिन बढ़ाकर फिर घटाई जाती है, जो जीर्ण श्वसन-रोग में तथा रसायन के रूप में प्रयुक्त होती है।
अवशोषण हेतु पिप्पली
अन्य Piper जातियों की भाँति यह अपने साथ के द्रव्यों की जैवोपलब्धता बढ़ाती है।
प्लीहा हेतु पिप्पली
प्लीहा-वृद्धि हेतु प्लीहा-रोग में नामित, जो योगों के भीतर ली जाती है।
हिक्का हेतु पिप्पली
हिक्का में प्रयुक्त — यह शास्त्रोक्त संकेत गृह-परम्परा में आज भी जीवित है।
अनिद्रा हेतु पिप्पली
एक कम ज्ञात शास्त्रीय प्रयोग, जो रात्रि में उष्ण दूध के साथ लिया जाता है।
सितोपलादि एवं तालीसादि में पिप्पली
लगभग प्रत्येक शास्त्रीय श्वसन-योग में उपस्थित।
मात्रा — कितना लें
चूर्ण 0.5–1 ग्राम मधु अथवा उष्ण दूध के साथ; शास्त्रीय रसायन-चिकित्सा में निगरानी के अन्तर्गत क्रमिक मात्राओं में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें।
मात्रा आयु, प्रकृति और अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
पारम्परिक प्रयोग — शास्त्रों के आधार पर प्रश्नोत्तर
उत्तर इस द्रव्य के लिए अंकित सन्दर्भों तथा गुण-कर्म से लिए गए हैं। कोई ऐसा अध्याय-श्लोक सन्दर्भ नहीं दिया गया जो अभिलेख में न हो।
पिप्पली, पीपल का वर्णन किन शास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है?
इस संग्रह में पिप्पली, पीपल के लिए निम्न ग्रन्थों के सन्दर्भ अंकित हैं: चरक संहिता (रसायन पाद (वर्धमान पिप्पली)); भावप्रकाश निघण्टु (हरीतक्यादि वर्ग).
चरक संहिता में पिप्पली, पीपल के विषय में क्या कहा गया है?
क्रमिक-मात्रा चिकित्सा में रसायन के रूप में वर्णित। सन्दर्भ: चरक संहिता — रसायन पाद (वर्धमान पिप्पली).
भावप्रकाश निघण्टु में पिप्पली, पीपल के विषय में क्या कहा गया है?
त्रिकटु के पाचक द्रव्यों में वर्गीकृत। सन्दर्भ: भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग.
आयुर्वेद में पिप्पली, पीपल किन स्थितियों में प्रयुक्त होता है?
पिप्पली एक श्वसन एवं पाचक द्रव्य है जो कास, श्वास तथा शीतजन्य अवरोध में, और लिप्त जिह्वा सहित अरुचि में प्रयुक्त होती है। यह शास्त्रोक्त योगवाही भी है — अन्य द्रव्यों को गहराई तक ले जाती है — इसीलिए उन योगों में मिलाई जाती है जिनके कर्म को बढ़ाना हो। रसायन के रूप में यह क्रमिक वर्धमान क्रम में दी जाती है।
पिप्पली, पीपल के आयुर्वेदीय गुण-कर्म क्या हैं?
रस कटु, गुण लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, वीर्य अनुष्ण (मृदु उष्ण), विपाक मधुर. दोष-कर्म: वात और कफ का शमन. प्रभाव: रसायन, वर्धमान, bioavailability enhancer.
पिप्पली, पीपल को यह दोष-कर्म क्यों दिया गया है?
द्रव्यगुण में दोष-कर्म रस, गुण, वीर्य एवं विपाक से निकलता है। पिप्पली, पीपल का वीर्य अनुष्ण (मृदु उष्ण) है और विपाक मधुर — इसी से इसका कर्म बनता है: वात और कफ का शमन.
पिप्पली, पीपल का कौन-सा अंग औषधि रूप में प्रयुक्त होता है?
प्रयोज्य अंग: फल.
पिप्पली, पीपल की शास्त्रोक्त मात्रा कितनी है?
चूर्ण 0.5–1 ग्राम मधु अथवा उष्ण दूध के साथ; शास्त्रीय रसायन-चिकित्सा में निगरानी के अन्तर्गत क्रमिक मात्राओं में प्रयुक्त। अपने वैद्य के परामर्श का पालन करें। मात्रा आयु, प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार बदलती है — योग्य वैद्य से पुष्टि अवश्य करें।
पिप्पली, पीपल का प्रयोग कब वर्जित है?
पाक तथा अल्प चिकित्सीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; बड़ी अथवा दीर्घ मात्रा पित्त बढ़ा सकती है। गर्भावस्था में सावधानी से प्रयोग करें।
पिप्पली, पीपल कहाँ पाया जाता है?
पिप्पली भारतीय उपमहाद्वीप की मूल निवासी पतली आरोही लता है, जो मध्य एवं दक्षिण भारत तथा उत्तर-पूर्व के उष्णतर, आर्द्र प्रदेशों में उगाई जाती है।
पिप्पली, पीपल किन शास्त्रीय योगों में सम्मिलित है?
Trikatu.
शास्त्रीय सन्दर्भ
- चरक संहिता — रसायन पाद (वर्धमान पिप्पली)
क्रमिक-मात्रा चिकित्सा में रसायन के रूप में वर्णित। - भावप्रकाश निघण्टु — हरीतक्यादि वर्ग
त्रिकटु के पाचक द्रव्यों में वर्गीकृत।
Modern research
-
From Ancient Spice to Advanced Science: Therapeutic, Nutraceutical and Nanotechnological Insights into Piper longum
(see source). Drug Design, Development and Therapy (2023)
A review of Piper longum (Pippali) documenting its immunomodulatory, bioavailability-enhancing (piperine), anti-inflammatory and antiasthmatic pharmacology.
View study
सुरक्षा एवं सावधानियाँ
पाक तथा अल्प चिकित्सीय मात्रा में सामान्यतः सुरक्षित; बड़ी अथवा दीर्घ मात्रा पित्त बढ़ा सकती है। गर्भावस्था में सावधानी से प्रयोग करें।
प्राप्ति स्थान
पिप्पली भारतीय उपमहाद्वीप की मूल निवासी पतली आरोही लता है, जो मध्य एवं दक्षिण भारत तथा उत्तर-पूर्व के उष्णतर, आर्द्र प्रदेशों में उगाई जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पिप्पली किसमें प्रयुक्त होती है?
सर्वोपरि जीर्ण कास, श्वास तथा श्वसनिका-शोथ में, और मन्द पाचन, प्लीहा-वृद्धि एवं हिक्का में भी। कटु द्रव्यों में यह असामान्य है कि उसे रसायन में वर्गीकृत किया गया है — केवल उत्तेजक नहीं, अपितु कायाकल्पकारी।
पिप्पली की मात्रा क्या है?
फल चूर्ण प्रतिदिन 500 मिग्रा – 1 ग्राम मधु के साथ। यह प्रबल एवं उष्ण है, अतः मात्रा अल्प रखी जाती है। त्रिकटु के भीतर भोजन से पूर्व उस संयोग का 1–2 ग्राम।
वर्धमान पिप्पली क्या है?
एक शास्त्रीय क्रमिक विधि जिसमें दैनिक मात्रा प्रतिदिन एक पिप्पली बढ़ाकर निर्धारित अधिकतम तक ले जाई जाती है, फिर उसी क्रम से घटाई जाती है। यह जीर्ण श्वसन-रोग में तथा रसायन के रूप में प्रयुक्त होती है, और चिकित्सक के निर्देशन में ही करनी चाहिए।
पिप्पली और काली मिर्च में क्या अन्तर है?
पिप्पली Piper longum है — मधुरतर, मन्दतर तथा अधिक विशेष रूप से श्वसन-सम्बन्धी, और रसायन में वर्गीकृत। काली मिर्च Piper nigrum है, अधिक तीक्ष्ण एवं तत्काल कटु। वे पृथक् द्रव्य हैं और किसी योग में परस्पर विनिमेय नहीं।
पिप्पली किसे नहीं लेनी चाहिए?
अम्लपित्त, परिणामशूल अथवा शोथयुक्त आन्त्र-विकार वाले किसी भी व्यक्ति को, क्योंकि यह प्रबल उष्ण है। गर्भावस्था में वर्जित। दीर्घ उच्च-मात्रा प्रयोग शास्त्रीय परम्परा में भी अनुचित माना जाता है, इसीलिए वर्धमान विधि अन्त में मात्रा घटाती है।
क्या पिप्पली फुफ्फुस हेतु अच्छी है?
यह प्रधान आयुर्वेदीय श्वसन-द्रव्य है, जो जीर्ण कास, श्वास तथा श्वसनिका-शोथ में प्रयुक्त होती है, और सितोपलादि एवं तालीसादि चूर्ण सहित लगभग प्रत्येक शास्त्रीय श्वसन-योग में सम्मिलित रहती है।
क्या पिप्पली प्रतिदिन ली जा सकती है?
किसी योग के भीतर अल्प मात्रा में, निर्धारित क्रमों में, हाँ। प्रबल उष्ण कटु द्रव्य का निरन्तर दीर्घकालीन प्रयोग अनुचित है — रसायन-विधि भी मात्रा बढ़ाकर पुनः घटाती है, ऊँची बनाए नहीं रखती।
इनका घटक: Trikatu